Saturday, 13 May 2023

Journey of a happy life...!!!!


शादी, 
ये सिर्फ एक शब्द नही है, शादी का असल मतलब आप तब समझ सकते हैं जब आप उस समय को महसूस करते हैं, उसके एक- एक मिनट को जीते हैं।

शादी तय होने से लेकर विदा होने तक आप ऐसी अलग-अलग यादें बनाते हैं जो आपको लाइफटाइम याद रहे।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है, तेजस्विनी ओझा से तेजस्विनी अंकुर बाजपेयी बनने का सफर बहुत ही प्यारा है।
शादी के बाद हर लड़की को एक नया घर मिलता है, एक नया रिश्ता जुड़ता है, नया माहौल, नए लोग सब कुछ नया, सब कुछ एक सपने जैसा लगता है, एक मीठा प्यारा सपना।
छोटी मोटी, नोक झोंक पर मन में ढ़ेर सारा प्यार यही पति पत्नी के रिश्ते को और मजबूत करता है, और रिश्ते की नींव होती है बॉन्डिंग।
लाख नाराज होने पर भी ख्याल रखना, "पता नही खाना खाने का समय मिला होगा या नही" "पता नही अपना ध्यान रख रहे होंगे कि नहीं" उफ उफ उफ इतने सारे सवाल पूरे पूरे दिन दिमाग में चलते हैं तो लगता है कि हां इसको ही प्यार कहते हैं, सिर्फ प्यार नही पारलौकिक प्रेम कहते हैं, ऐसा प्यार जिसे सोचकर लगता है की हां यही रिश्ता मुझे सात जन्मों तक चाहिए।

मां पापा के जैसा सपोर्ट मिल तो लगता है लाइफ पटरी पर आ गई है, सब कुछ जैसे अपना लगने लगता है, जो चीजें नहीं आती वो सीखना, सुबह शाम की आरती में उनका साथ देना, बातें करना, साथ में चाय पीना ।
ननद का प्यार मिलना तो जैसे की ने हाथ पकड़ कर कहा हो, "अरे घबराओ नहीं , मैं हूं ना तुम्हारे पास" अकेले होने पर दिन में तीन बार पूछना "बेटू खाना खा लिया", "अपना ध्यान रखना" "क्या भिजवा दूं तुम्हारे लिए" "कोई भी चीज की जरूरत पड़े तो ले जरूर लेना" ये सब चीजें इतना अपनापन देती हैं कि लगता है की मैं बहु नही बल्कि इस घर की बेटी हूं, और भोलेनाथ की कृपा से जीवन सफल हो गया है।

हां लखनऊ छोड़ना मेरे लिए आसान नहीं था, अपने मम्मी पापा को अकेले छोड़ के आना तो बिलकुल भी नहीं, रोज़ उनके साथ बैठना, मूवीज़ देखना, डांस करना, उनको परेशान करना, पापा का लैपटॉप की सेटिंग्स के साथ छेड़ छाड़ करना आज शादी के दस महीने बाद भी मुझे याद आता है, मम्मी के हाथ का राजमा चावल तो खास तौर से पर इस बात को खुशी भी है की यहां आकर मुझे दुनिया के सबसे प्यारे और सबसे खूबसूरत रिश्ते मिले।
आज पता नही कैसे लैपटॉप खुला है और लिखने का मन कर बैठा, आज समझ में आया कि लिखने के लिए सिर्फ दिमाग की जरूरत नहीं होती, कुछ बातें जब दिल से लिखी जाती हैं, तो उसकी छाया अलग ही उभर कर आती है, और शायद मन से कागज़ पर उतारे गए शब्द अलग छाप छोड़कर जाते हैं।

इतने सालों बाद लिख कर बहुत अच्छा लगा।

- तेजस्विनी अंकुर बाजपेई।




Saturday, 23 November 2019

भभूत की वो राख

भटक-भटक मन भटका क्यों,
क्यों मन में ये ठहराव लगे,
हो प्रभु तुम्हारा ध्यान मन में,
तो सारी परेशानी भभूत की वो राख लगे।

लाख तकलीफें, डर, भय मन में,
सब मुझे अब क्षणिक लगे,
बोल तू बोल तू बोलता जा तू (इंसान),
तेरा अस्तित्व मुझे अब भभूत की वो राख लगे।

ये पैसा, ये रुतबा, ये प्यार ये सब मुझे अब छलावा लगे,
एक तू सच्चा, तेरा नाम ही सच्चा,
बाकी तो ये दुनिया मुझे भभूत की वो राख लगे।

-तेजस्विनी ओझा।

Thursday, 29 August 2019

गोल्डन डेज पर किसकी बुरी नज़र??


आपलोगों को शायद अपना बचपन याद होगा खूब सारे ओउत्दोर्स गेम्स कभी कंचे,कभी क्रिकेट,कभी बैडमिंटन,लुक्का चुप्पी, आम पेड़ के आम तोड़ तोड़ के खाना में बहुत इंजॉय तो ज़रूर ही करते होंगे आपलोग... मेरी मम्मी के ज़हन मेंतो अभी तक अपनी गर्मी की छुट्टियों की यादें ताज़ा हैं कैसे सबलोग गाँव जाकर छुट्टियाँ मनाकर सारे भाई बेहेन मिलकर खूब सारे गेम्स खेलते थे... हमलोगों को तो इमेजिन करके भी बहुत अच्छा लगता है की कितने एंजोयमेंट के साथ गर्मी की हॉलीडेज बीतती होंगी...पर अब शायद उन गोल्डन डेज पर किसी की बुरी नज़र लग गयी है और वो बुरी नज़र वाले हैं आज कल बच्चो के फ्रेंड ‘’गैजेक्ट्स’’...इन गैजेट्स की वजह से ही बच्चे आउटडोर्स गेम्स से बचकर अपने आई फ़ोन, आई पेड या लैपटॉप पे अपना आधे से भी ज्यादा टाइम स्पोइल करते हैं और इन्ही सब की वजह से आज बच्चो में गाँव जाकर खेत देखने और आम तोड़ तोड़ के खाने का कोई क्रेज नहीं है वो इन सबको अपने गैजेट्स के आगे उसकी जूती भी नहीं मानते हैं यही रीज़न है की अब बच्चों के हाथ में आई फ़ोन होता है और बैडमिंटन रैकेट, और क्रिकेट का बल्ला धुल खाते हुए पड़ा रहता है अगर गलती से भी उनका गैजेट टूट जाए या खराब हो जाए वो ऐसे रियेक्ट करते हैं जैसे उनका गैजेट कोई लिविंग थिंग हो...आज कल की यही टेक्नोलॉजीस बच्चो को मानसिक रूप से बीमार कर रही हैं और उनको चिड-चिड़ा बना रही हैं...पहले के कुछ समय तक तो बच्चो में साइकिललिंग का बहुत क्रेज था हर कोई सिर्फ साइकिल चलाते हुए ही दीखता था बट अब सबकी साइकिल कोने में धुल खाती पड़ी रहती है...लैप्तोप्स सिर्फ खेलने के लिए ही नहीं बनें हैं इसमें हम क्रिएटिव चीज़ों पर भी सर्च कर सकते हैं और नए नए एप्स से हम और भी नयी नयी चीज़ें सीख सकते हैं...आज कल के तो स्टूडेंट्स को देखिये स्कूल या कॉलेज से आये बैग एक तरफ फेंका और शुरू हो गए अंगूठा घिसना अब तो शायद... आपको भी बहुत कम ही बच्चे अपनी कॉलोनी ने नीचे खेलते हुए दीखते होंगे मैं सिर्फ ये ही नहीं कह रही की वो अपने गैजेट्स की दुनिया में खोये होंगे मैं ये कह रही हूँ की आज के स्टूडेंट्स अपने क्लासमेंट्स से भी आगे निकलने के लिए तैयार खड़े हैं और जैसे ही उनको खाली टाइम मिलाता है बार शुरू हो जाते हैं अंगूठा घिसना...पर शायद ये गैजेट्स हमपर इस तरह हावी हो रहें की चाह कर भी हम इनसे दूर नहीं रह सकते.
आप सब भी जितना ज्यादा हो सके आउटडोर्स गेम्स खेलें ताकि गोल्डन डेज वापस फिर से आकर पुराने गेम्स का वेलकम बेक कर सकें.    

Friday, 28 September 2018

धरती माँ बीमार हैं..!!


                                        

न जाने कितने समय या कहें सदियों से धरती माँ हम पर मेहरबान हैं, क्या कुछ नही किया है धरती ने हमारे लिए. उपजाऊ ज़मीन, पानी, हवा सब कुछ हमें गिफ्ट में मिल चूका है, तभी हमारे समाज में धरती, वायु, जल और सूर्य को इतना पूजा जाता है.
आज मुझे ऐसा लग रहा है की हमारी धरती माँ बीमार हैं. यह लगना स्वाभाविक है. एक रात सोते सोते अचानक मेरी नींद खुली, कमरे में घुटन सी महसूस हुई. खिड़कियाँ खुली थीं, फिर भी दम घुट रहा था. बरामदे में गयी तो वहां धीमी- धीमी हवा से रहत महसूस हुई. मेरी घुटन का सबसे बड़ा रीजन था  पॉल्यूशन. पॉल्यूशन तो शाम को भी था जब बाहर घूमने गयी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों का धुंआ ही था. लगा थोड़ी देर के लिए भी वहां रुकी तो बीमार पड़ जाउंगी. मुझे न सडकों पर न ही पार्कों में   शुद्ध हवा मिली. तभी मुझे अहसास हो गया था कि हमारी धरती माँ बीमार हैं. हम अपनी प्यारी धरती मां को घुट घुट कर जीने को मजबूर कर रहे हैं. एक दिन आयेगा जब धरती की बर्दाश्त करने की क्षमता ख़त्म हो जाएगी और पृथ्वी के साथ हम भी नहीं बचेंगे.
हम किस कदर अपने पर्यावरण से छेड़छाड़ कर रहें हैं इसका उदाहरण धार्मिक अनुष्ठान और दूसरे कर्मकांड हैं. हम भगवान् से कामना तो सुख समृद्धि की करते हैं लेकिन बदले में देते हैं ढेर सारा कचरा. हर साल की तरह फिर से इस साल गणपति बाप्पा पधारे, 10 दिनों तक चलने वाले इस गणेश उत्सव की रौनक देखते बनती थी. सुंदर सुंदर पंडालों में बाप्पा के आगे हाथ जोड़ कर आप ने भी कई मनोकामनाएं की होंगी. दस दिन के बाद गणेश जी का नाचते गाते गुलाल उड़ाते हुए विसर्जन हुआ. लेकिन अपनी मनोकामना पूरी करने के चक्कर में हमने नदियों में प्रदूषण बढ़ा दिया. नदी में प्रतिमा छोड़ कर हम समझतें रहे हैं गणपति की कृपा होगी लेकिन जहाँ वायु और जल प्रदूषित हो वहां कृपा कैसे बरस सकती है. नवरात्रि भी आने वाली है.माँ दुर्गा हर पंडाल में कपूर की खुशबू के साथ विराजमान होंगी और 9 दिनों के बाद सिन्दूर के साथ उनका भी विसर्जन हो जाएगा. और एक बार फिर मनमोहक मा की  मूर्ती विसर्जन के बाद नदियों में पड़ी होंगी. फल की कामना के बदले दुष्परिणाम हमारी नदियाँ भुगद रही होंगी. ज़रा सोचिए क्या ये भगवान् का अपमान नही है, जिस भगवान् के आगे आपने हज़ारों मन्नतें मांगी, जिनसे अगली बरस जल्दी आने का वादा लिया उनका ऐसे विसर्जन किया. अगर आप भगवान का सम्मान सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए करते हैं तो उन्हें पंडालों में लाने का भी आपको कोई अधिकार नही है. भगवान् को एक एंटरटेनमेंट का एक जरिया न बनायें. गणेश उत्सव और नवरात्रि ईको फ्रेंडली बनायें  खुद को और दूसरों को भी खुली हवा में सांस लेने दें.
- तेजस्विनी ओझा, लखनऊ         


Wednesday, 2 August 2017

                 हरियाली फैलाता कौन...?? 
धरती एक बहुत ही सुन्दर सी जगह जहां हम सब लोग रहते हैं एक अनोखा प्लेनेट जहां प्रकृति हम पर मेहरबान है क्या नही है हमारी धरती पर पानी उपजाऊ मिटटी और सबसे ज़रूरी चीज़ पेड़ पौधे जिनसे हमें ऑक्सीजन मिलती है पर पता नही क्यों लोगो को ये बात समझने में वक़्त लगता है की पेड़ हमारे वातावरण के लिए ज़रूरी है. जहां ज़रुरत पड़ी लकड़ी है वहाँ लगे पेड़ पर आरी चलाने या अगर कोई पेड़ कार खडी करने का रास्ता रोक रहा है तो बस आ जाता है लोगों को गुस्सा और उतार देते हैं पेड़ों पर.ये आगे जाकर आपके लिए ही नही नेचर के लिए भी बड़ा खतरा साबित हो सकता है. आईये आपको एक कहानी सुनाती हूँ मेरे घर के पास एक नया पेड़ लगा है गुलमोहर का और देखते हुए ख़ुशी हो रही है की वो पेड़ बारिश की बूंदों के साथ बड़ा हो रहा है. आपको हैरानी होगी जब आपको ये पता चलेगा की वो पेड़ वन विभाग के अधिकारोयों ने नही बल्कि एक बूढ़े आदमी ने लगाया है जब पहली बार मैंने उस आदमी को पेड़ लगाते हुए देखा था तो लगा शायद कपडे डालने के लिए वो तार लगा रहा होगा पर जब एक दिन हमलोग तेहेलने निकले तो देखा की उस पेड़ में पत्तियाँ आ रही हैं यकीन मानिए मेरा मन ख़ुशी से झूम रहा है मुझे इंतज़ार है की कब वो पेड़ बड़ा होगा. तो देखा आपने जब एक वृद्ध आदमी उस पेड़ को लगा सकता है अपने पर्यावरण का ध्यान रख सकता है तो हम और हमारा यूथ क्यों नही, आज के यूथ के पास एडवांस टेक्नोलॉजी के गैजेट्स हैं 4जी फ़ोन है अनलिमिटेड डाटा है तो क्या एक कदम हमलोग अपने पर्यावरण को बचाने में नही ले सकते हमलोग प्राइमरी से पढ़ते आ रहे हैं की पेड़ हमारे नेचर के लिए सबसे ज़रूरी है पर शायद बड़े होकर हमलोग वो लेसन भूल चुके हैं. प्लीज आज के समय में हमारे नेचर को प्योर हवा की ज़रुरत है हमें प्योर हवा की ज़रुरत है 1970 में हुए चिपको आन्दोलन को फिर से शुरू करने की ज़रुरत पड़ने लगी है. अपने थोड़े से टाइम के बेनिफिट के लिए अपने पर्यारण को जोखिम में मत डालिए पर ये देखकर अच्छा लगता है की कुछ लोग वन विभाग के लगाए पेड़ों की जाली न बेचकर उन पेड़ों का अच्छे से ध्यान रख रहे हैं वो लोग ज्यादा पढ़े लिखे नही हैं पर अपने नेचर का ख्याल रखना उन्हें बखूबी आता है. आप भी चाहे तो दूर नही अपने घरों के पास पेड़ लगा सकते हैं बाहर निकलिए अपने आस पास देखिये पेड़ काटने वालों को रोकीये जितना हो सके ईको फ्रेंडली चीज़ों का इस्तेमाल करीए मैं यूथ से कहना चाहती हूँ आप चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं नेचर से रिलेटेड बुक्स पढ़िए गूगल सर्च करीए नही तो ग्लोबल वार्मिंग जैसी हानिकारक लेयर हमारी प्यारी से धरती को नष्ट कर देगी. आई थिंक आप तक मेरे कहने का मतलब पहुच गया होगा बाकी सारी एक्टिविटीज हमे आपको और हमको मिल कर करनी होगी मैं तो तैयार हूँ क्या आप तैयार हैं..??
                                                       -तेजस्विनी

Sunday, 26 February 2017

उसका आशियाना

आज मेरी खिड़की पर आ बैठी एक चिड़िया,
मैंने पूछा कैसे बनता है तेरा आशियाना,
बोली होना है मुश्किल बनाना ,
जोड़ती हूँ मैं तिनका-तिनका पड़ता है खाना लाना,
कभी कभी बच्चे खेल में तोड़ देते हैं मेरा ठिकाना।
रात होती ही काँप उठती हूँ मैं डर से,
आती है आवाज़ें उसकी(उल्लू की) न जाने कहाँ से,
फिर सुबह होती है नए उजाले के साथ ,
फिर हवा बतियाने लगती है मेरे साथ -साथ ,
जुड़ती है मेरी हर ख़ुशी तिनके के साथ साथ।
  -- तेजस्विनी तमन्ना ओझा।

Sunday, 13 November 2016

वो बचपन वापस आ जाए!!

                 
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस खिलौने से खेल कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस समय को पीछे छोड़कर, 
कहाँ चले गये तुम बिन बताकर,
क्यों कहीं छुप के बैठ गये तुम मुझसे रूठकर.

काश आ जाए वापस वो खरगोश मेरा,
जिसे सुलाती थी मैं अपने बगल में लेटाकर,
न जाने कहाँ गया वो खरगोश मुझे छोड़कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस खिलौने से खेल कर.

अब तो बस जीना है मुझे किताबों के अन्दर,
जीना चाहती हूँ मैं फिर से बचपन के अन्दर,
वापस आ जाए वो मेरा प्यारा बचपन,
फिर से जी लूंगी मैं उसे बच्चा बनकर.

                             


  

Journey of a happy life...!!!!

शादी,  ये सिर्फ एक शब्द नही है, शादी का असल मतलब आप तब समझ सकते हैं जब आप उस समय को महसूस करते हैं, उसके एक- एक मिनट को जीते हैं। शादी तय हो...