स्कूल वाहनों की दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं.
लेकिन आजकल पेरेंट्स कितने बिज़ी होते की उनके पास अपने बच्चों को स्कूल
छोडऩे का भी टाइम नहीं मिलता. वैसे तो पेरेंट्स स्कूल वैन और बसेस पर
भरोसा करते हैं पर उनको नहीं पता कि ऐसा करके वो अपने बच्चों को
इनडायरेक्टली जोखिम में धकेल रहे हैं. खैर इसमें गलती पेरेंट्स की भी नहीं
है। चुप-चाप बच्चों को वैन में बैठाया, हाथ हिला के बाय किया और वापस घर या
अपने ऑफिस की तरफ बढ़ जाते हैं। पर उनको स्कूल वैन या बस के अन्दर के
हालात की खबर नहीं होती है. आज आपको बताते हैं कि इन वाहनों में किस हालात
से बच्चे गुजऱते हैं. जो स्कूल वैन्स या आटो आपको सडक़ों पर दौड़ते दिखते
हैं, वो बाहर से तो अच्छे दिखती है पर अन्दर के हालात कुछ और होते हैं.
अधिकतर स्कूल वैन्स की सीटें खराब होती हैं, स्प्रिंग्स और कीलें निकली
होती हैं. उसमें बच्चों को ठूंस दिया जाता है जिससे कभी हाथ में चोट लगती
है कभी कपड़े फट जाते हैं. इन वैन्स में फस्र्ट एड का भी कोई इंतजाम नहीं
होता. हाइजीन की भी कोई चिंता नहीं रहती. इसके ड्राईवर मुंह में गुटखा
ठूंसे रहते हैं. कही भी सिगरेट-बीड़ी पीने लगते हैं, जिसका स्टूडेंट्स के
हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है. आप बिलीव नहीं करेंगे पर कुछ स्कूल वैन में
सीएनजी के 1 नहीं 2-2 सिलिंडर खुले में लगे रहते हैं जिससे कभी भी कोई बड़ा
एक्सीडेंट हो सकता है. टचवुड ऐसा कभी न हो.बच्चे इस कदर गाडिय़ों में ठुसे
रहते हैं की क्रॉस वेंटिलेशन तो क्या सांस लेने की भी जगह नहीं रहती. अगर
बात की जाए इने फिटनेस सर्टिफिकेट की तो अभी तक ज्यादातर वाहन फिट नहीं
होते हैं लेकिन चेकिंग न होने से इनकी चांदी है. न आरटीओ इसकी जांच करता है
और न ही ट्रैफिक पुलिस को कोई परवाह है..सिटी में इस समय करीब 175स्कूल
बसेस हैं और 528 स्कूल वैन्स जबकि आरटीओ ऑफिस के आंकड़ों में 108 बसें और
322 स्कूल की वैंस ही रजिस्टर्ड है अब आप आप ही अंदाज लगा सकते हैं कि
बच्चों की जिंदगी के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है. अब ये आपको तय करना
है की क्या सही है और क्या गलत.
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Monday, 11 August 2014
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Journey of a happy life...!!!!
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