आज मैंने मम्मी से एक सरदार जी की कहानी सुनी...ये बात मम्मी के चाइल्डहुड से है। एक सरदार बच्चा जो दूसरी क्लास में पढ़ता था और मम्मी का क्लासमेट था। बहुत ही सीधा सादा । एक दिन वो अपने पापा के साथ मम्मी की कॉपी से होमवर्क उतारने आया क्योंकि उसको ब्लैक बोर्ड से उतारकर लिखने में प्रॉब्लम होती थी। मम्मी को उसका चेहरा अब भी याद है। एक कोने बैठकर वो चुप चाप काम कर रहा था। मेरे नानाजी और उनके पापा अच्छे दोस्त थे। अगले दिन जब मेरी मम्मी स्कूल गयीं तो उन सरदार जी अंकल ने कहा कि गरिमा तू मेरे साथ बैठा कर। उसके बाद से ही मम्मी ने उनके साथ बैठना शुरू कर दिया और वो अंकल बहुत ही सिक्योर और सेफ फ़ील करता था। एक बार मम्मी का सोशल स्टडीज का पीरियड था उस समय स्कूल बैग्स का प्रचलन नहीं था उस समय सूट केस टाइप का बॉक्स होता था जिसमें बच्चे अपनी सारी चीज़ें रखते थे। एक बार सबसे आगे बैठा वो बच्चा बार-बार अपना केस खोलकर चीज़ें निकाल रहा था। उसके उस केस पर सूरज की रौशनी पड़ रही थी और उसकी डायरेक्ट रौशनी वहां मौजूद टीचर के चेहरे पर पडऩे लगी। उस टीचर को इतना गुस्सा आया कि उनको बहुत मारा वो सिर्फ सिसक-सिसक कर रो रहे थे और उनकी आगे कुछ कहने ही हिम्मत ही नहीं पड़ी। अब आप इमेजिन करिए की किसी छोटे बच्चे को बुरी तरह से पीटना क्या सही है और बेचारा बच्चा ये सोच ही नहीं पा रहा की उसकी गलती क्या है.... फिर क्लास थर्ड में उनके पापा का ट्रान्सफर चंडी गढ़ से कहीं और हो गया और वो हमेशा के लिए चले गए। सोच सोच कर ही कितना गुस्सा आता है की पहले के समय में ऐसे टीचर्स होते थे जो बच्चो को इतनी बुरी तरह से पीटते थे की उनका हाथ पैर सूज जाते थे। धूप में खड़ा करना, क्लास में बेंच के ऊपर खड़ा करना ये सब उस समय पनिशमेंट के तरीके थे। टाइम बीत गया और अब तो ये नीयम बना दिया गया है कि अगर किसी टीचर ने स्टूडेंट्स की पिटाई की तो उसका सीधा असर टीचर और प्रिंसिपल करियर पर पड़ेगा। काश पहले के ज़माने में भी कोई ऐसा नीयम होता तो शायद वो अंकल पिटाई से बाच जाते। अब तो ऐसा टाइम आ गया है की अगर बच्चे को थोड़ी सी भी डाट पड़े तो वो जाकर अपने पेरेंट्स को सब बताता है। कुछ हद तक गलती पेरेंट्स की भी है की वो ध्यान ही नहीं दे पाते थे की कहीं बच्चे को कोई प्रॉब्लम फेस तो नहीं करनी पड़ रही? कहीं मेरे बच्चे को उस चीज़ की पनिशमेंट तो नहीं मिल रही जो गलती उसने की ही नहीं है? पर टाइम बीतते देर नहीं लगती आज कल के पेरेंट्स बहुत धान रखते हैं- बच्चा किस तरह के फ्रेंड्स बना रहा है, कहीं टीचर्स उसे कुछ कह तो नहीं रहे बच्चो की रोज़ स्कूल डायरी चेक करना, उसे एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में पर्टिसिपेट कराना, पढ़ाना सब कुछ पेरेंट्स की निगरानी में होता है। पर काश उस समय भी ये सब अवेयरनेस होती तो शायद उन अंकल के साथ ये सब कुछ नहीं होता और शायद आगे कोई बच्चा ये न कहे की मैडम मेरी गलती क्या है??
Sunday, 31 August 2014
Monday, 11 August 2014
बच्चों की जान जोखिम में..!
स्कूल वाहनों की दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं.
लेकिन आजकल पेरेंट्स कितने बिज़ी होते की उनके पास अपने बच्चों को स्कूल
छोडऩे का भी टाइम नहीं मिलता. वैसे तो पेरेंट्स स्कूल वैन और बसेस पर
भरोसा करते हैं पर उनको नहीं पता कि ऐसा करके वो अपने बच्चों को
इनडायरेक्टली जोखिम में धकेल रहे हैं. खैर इसमें गलती पेरेंट्स की भी नहीं
है। चुप-चाप बच्चों को वैन में बैठाया, हाथ हिला के बाय किया और वापस घर या
अपने ऑफिस की तरफ बढ़ जाते हैं। पर उनको स्कूल वैन या बस के अन्दर के
हालात की खबर नहीं होती है. आज आपको बताते हैं कि इन वाहनों में किस हालात
से बच्चे गुजऱते हैं. जो स्कूल वैन्स या आटो आपको सडक़ों पर दौड़ते दिखते
हैं, वो बाहर से तो अच्छे दिखती है पर अन्दर के हालात कुछ और होते हैं.
अधिकतर स्कूल वैन्स की सीटें खराब होती हैं, स्प्रिंग्स और कीलें निकली
होती हैं. उसमें बच्चों को ठूंस दिया जाता है जिससे कभी हाथ में चोट लगती
है कभी कपड़े फट जाते हैं. इन वैन्स में फस्र्ट एड का भी कोई इंतजाम नहीं
होता. हाइजीन की भी कोई चिंता नहीं रहती. इसके ड्राईवर मुंह में गुटखा
ठूंसे रहते हैं. कही भी सिगरेट-बीड़ी पीने लगते हैं, जिसका स्टूडेंट्स के
हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है. आप बिलीव नहीं करेंगे पर कुछ स्कूल वैन में
सीएनजी के 1 नहीं 2-2 सिलिंडर खुले में लगे रहते हैं जिससे कभी भी कोई बड़ा
एक्सीडेंट हो सकता है. टचवुड ऐसा कभी न हो.बच्चे इस कदर गाडिय़ों में ठुसे
रहते हैं की क्रॉस वेंटिलेशन तो क्या सांस लेने की भी जगह नहीं रहती. अगर
बात की जाए इने फिटनेस सर्टिफिकेट की तो अभी तक ज्यादातर वाहन फिट नहीं
होते हैं लेकिन चेकिंग न होने से इनकी चांदी है. न आरटीओ इसकी जांच करता है
और न ही ट्रैफिक पुलिस को कोई परवाह है..सिटी में इस समय करीब 175स्कूल
बसेस हैं और 528 स्कूल वैन्स जबकि आरटीओ ऑफिस के आंकड़ों में 108 बसें और
322 स्कूल की वैंस ही रजिस्टर्ड है अब आप आप ही अंदाज लगा सकते हैं कि
बच्चों की जिंदगी के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है. अब ये आपको तय करना
है की क्या सही है और क्या गलत.
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