आज चिल्ड्रेन्स डे है हर बच्चा ख़ुशी ख़ुशी स्कूल की तरफ जा रहा है। कलरफुल ड्रेस में हाथ में गुलाब लेकर हर बच्चे के चेहरे पर बड़ी सी स्माइल है। स्कूल जाकर दो घंटे का रिसेस ब्रेक पूरा दिन ग्राउंड में क्रिकेट, बैडमिंटन, ऑडिटोरियम में एक्स्ट्रा कलिकुलर एक्टिविटीज कोई रोक टोक नहीं। टीचर्स के साथ प्यारी प्यारी पिक्स और उसके बाद घर। कितना प्यारा शेड्यूल है। इसे सोचकर तो ऐसा लग रहा है कि काश हम फिर से बच्चे बन जाएं।पर टीवी देखकर के मन फिर से खराब हो गया चाइल्ड लेबर की कुछ फोटो टीवी पर दिखाई गयीं जिसपर बच्चों को भूखा प्यासा फुटपाथ पर मारा जाता है और सुबह ज़बरदस्ती उठाकर धंधे में लगा दिया जाता है । ठण्ड में ढंग के कपडे भी नहीं और भूखे बच्चे ज़बरदस्ती काम या धंधे में ठेले जाते हैं और अगर गलती से भी कोई काम गलत हो या कोई चीज़ गलती से भी टूट जाए तो उनको फिजिकली और मेंटली टार्चर किया जाता है। जिससे उनके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ता है। प्लस काम के बदले में उन्हें न तो कपडे ढंग के मिल पाते हैं और न ठण्ड की रात गुज़ारने के लिए जगह। इंडिया में लगभग 27 लाख बच्चे चाइल्ड लेबर का शिकार हैं । यहाँ उन बच्चों को काम दिया जाता है जिनके पेरेंट्स ने ओनर से कर्र्ज ले रखा हो या उन बच्चो को गिरवी रखा गया हो।
मैं बात सिर्फ बाल मजदूरी की ही नहीं कर रही हूँ , मैं उन बच्चों की भी बात कर रही हूँ जो स्टूडेंट्स हैं पर उनका मिडिल क्लास या लोअर मिडिल क्लास का होने की वजह से उन्हें भी रोज़ इस मेंटल और फिजिकल टार्चर से गुजऱना पड़ता है। अभी कल ही टीवी में देखा एक छोटा सा 12 साल का बच्चा बीमार होने की वजह से स्कूल नहीं आ पाया तो टीचर उसे पहले प्रिंसिपल के पास ले गए । उन्होंने उसे प्यार से समझाने के बजाये लोहे की रॉड से इतना मारा की उसके हाथ पैर नीले हो गए और फिर जब वो बच्चा क्लास पंहुचा तो क्लास टीचर ने भी उसे लकड़ी के स्केल से इतना मारा की बच्चा वहीं बेहोश हो गया और उसे ये भी धमकी मिली की खबरदार घर में जाकर कुछ बताया, मैं तुम्हारे माँ बाप से नहीं डरता हूँ....उसके बाद वो बच्चा इतना ज्यादा डर गया की उसने ऐसा कदम उठाया की आज वो बच्चा हमारे बीच नहीं है । पर पेपर पर उसने उन टीचर्स के नाम लिखे जिन्होंने उस बच्चे को एब्यूज किया अब देखते हैं उन घटिया मेंटालिटी के टीचर्स को इसकी क्या सजा मिलती है । और अब आपको आगे आने की ज़रुरत है ताकि बच्चा अपने पेरेन्ट्स से अपनी परेशानी शेयर कर सके और उसे इतना मेंटल टार्चर न झोलना पड़े। अब आप पूरा दिन अपने आप से पूछिए की क्या यही है बाल दिवस?
तेजस्विनी ओझा उपमन्
यु
