यह पोस्ट आपको थोडा कन्फ्यूज्ड मिलेगा पर क्या किया जा सकता है। सिर्फ ब्लोगिंग ही एक ऐसा जरिया है जिससे मैं अपनी दिमाग की उलझनों और दिमाग में उठ रहे अनेक सवालों को उतार सकती हूँ। आज का हर युवा सोशल नेटवर्किंग साईट का यूज़ करता है, हर यूथ के मन में यही क्वेश्चन उठता है की पता नहीं मेरे फोटोज पर कितने लाइक्स और कमेंट्स आये होंग, पता नहीं फलाने आदमी ने मेरे मेसेज का रिप्लाई किया होगा की नहीं। और अगर आपको अपनी आईडी खोलने पर सीन दिख जाए पर कोई रिप्लाई न हो तो आपका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। फेसबुक व्हाट्स एप के लती लोगों के मन में ऐसी फीलिंग्स रोज़ आती होंगी कि अरे यार मैं तो उसको अच्छी तरह जानता हूँ । तो फिर उसने मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट क्यों रिजेक्ट की? या फिर मैं उससे कितना कंसर्न रहती हूँ या रहता हूँ फिर भी सीन करके छोड़ किया कितना मतलबी आदमी है। उसके बाद आप जो बुरी तरह हडक़ाते हो उस व्यक्ति को। आपको खुद नहीं पता रहता की आप बोल क्या करे हो। यह पढऩे के बाद आपको समझ में तो आ ही गया होगा की मैं बोलना क्या चाह रही हूँ । इसी को हम कहते हैं ‘ईगो’ जो बिन बात के कभी कभी हर्ट करता है। पर सोचने वाली बात तो ये है कि ऐसे क्वेश्चन हमारे मन में उठते ही क्यों हैं हम बस एक मैसेज दे कर चुप क्यों नही बैठ जाते या किसी ने अगर हमारी फ्रेंड रिक्वेस्ट रिजेक्ट भी कर दी तो हम उसे इज्नोर क्यों नहीं करते? क्योंकि हमारे ईगो उससे जुड़ जाता है और अपने ईगो के आगे हमे कुछ दिखाई या सुनाई नहीं देता। मैंने भी यही ईगो को कई बार अपने ऊपर हावी होते हुए देखा है ये वही ईगो था जो मुझे पूरी तरह अपने कण्ट्रोल में करने की ठान चुका था। पर कोई था जिसने मुझे इस जंजाल से निकाला। वो थे मेरे पापा उन्होंने मुझे बताया की हमको कोई फर्क नहीं पडऩा चाहिए की फलाना आदमी हमारे मैसेज का रिप्लाई कर रहा है कि नहीं। कौन हमारी पिक्स को लाइक कर रहा है और कौन नहीं, कौन हमारी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर रहा है और कौन नहीं। हमको सिर्फ अपने काम में बिजी रहना चाहिए। क्योंकि यही सब चीज़ें हमे पथ भ्रमित करती हैं और अपनी लाइफ के लक्ष्य से हमें भटका देती हैं। मैं तो ये बात समझ चुकी हूँ की ईगो को अपने ऊपर इतना हावी मत होने दो की वो आपको पूरी तरह बर्बाद कर दे। पर अब ये आप पर डिपेन्ड करता है की आपकी विल पावर कितनी स्ट्रंाग है और इस बात को अपनी लाइफ में कितना उतार पाते हो तबतक बी ब्लेस्ड..।
Tuesday, 20 January 2015
अपने ईगो को कंट्रोल करें
यह पोस्ट आपको थोडा कन्फ्यूज्ड मिलेगा पर क्या किया जा सकता है। सिर्फ ब्लोगिंग ही एक ऐसा जरिया है जिससे मैं अपनी दिमाग की उलझनों और दिमाग में उठ रहे अनेक सवालों को उतार सकती हूँ। आज का हर युवा सोशल नेटवर्किंग साईट का यूज़ करता है, हर यूथ के मन में यही क्वेश्चन उठता है की पता नहीं मेरे फोटोज पर कितने लाइक्स और कमेंट्स आये होंग, पता नहीं फलाने आदमी ने मेरे मेसेज का रिप्लाई किया होगा की नहीं। और अगर आपको अपनी आईडी खोलने पर सीन दिख जाए पर कोई रिप्लाई न हो तो आपका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। फेसबुक व्हाट्स एप के लती लोगों के मन में ऐसी फीलिंग्स रोज़ आती होंगी कि अरे यार मैं तो उसको अच्छी तरह जानता हूँ । तो फिर उसने मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट क्यों रिजेक्ट की? या फिर मैं उससे कितना कंसर्न रहती हूँ या रहता हूँ फिर भी सीन करके छोड़ किया कितना मतलबी आदमी है। उसके बाद आप जो बुरी तरह हडक़ाते हो उस व्यक्ति को। आपको खुद नहीं पता रहता की आप बोल क्या करे हो। यह पढऩे के बाद आपको समझ में तो आ ही गया होगा की मैं बोलना क्या चाह रही हूँ । इसी को हम कहते हैं ‘ईगो’ जो बिन बात के कभी कभी हर्ट करता है। पर सोचने वाली बात तो ये है कि ऐसे क्वेश्चन हमारे मन में उठते ही क्यों हैं हम बस एक मैसेज दे कर चुप क्यों नही बैठ जाते या किसी ने अगर हमारी फ्रेंड रिक्वेस्ट रिजेक्ट भी कर दी तो हम उसे इज्नोर क्यों नहीं करते? क्योंकि हमारे ईगो उससे जुड़ जाता है और अपने ईगो के आगे हमे कुछ दिखाई या सुनाई नहीं देता। मैंने भी यही ईगो को कई बार अपने ऊपर हावी होते हुए देखा है ये वही ईगो था जो मुझे पूरी तरह अपने कण्ट्रोल में करने की ठान चुका था। पर कोई था जिसने मुझे इस जंजाल से निकाला। वो थे मेरे पापा उन्होंने मुझे बताया की हमको कोई फर्क नहीं पडऩा चाहिए की फलाना आदमी हमारे मैसेज का रिप्लाई कर रहा है कि नहीं। कौन हमारी पिक्स को लाइक कर रहा है और कौन नहीं, कौन हमारी फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर रहा है और कौन नहीं। हमको सिर्फ अपने काम में बिजी रहना चाहिए। क्योंकि यही सब चीज़ें हमे पथ भ्रमित करती हैं और अपनी लाइफ के लक्ष्य से हमें भटका देती हैं। मैं तो ये बात समझ चुकी हूँ की ईगो को अपने ऊपर इतना हावी मत होने दो की वो आपको पूरी तरह बर्बाद कर दे। पर अब ये आप पर डिपेन्ड करता है की आपकी विल पावर कितनी स्ट्रंाग है और इस बात को अपनी लाइफ में कितना उतार पाते हो तबतक बी ब्लेस्ड..।
Sunday, 11 January 2015
कहां गुम को गए टॉम एंड जेरी
क्या बच्चे क्या बड़े,
टॉम एंड जेरी सब के चहेते हैं. इनके कार्टून्स को आप जितना चाहो नहीं भूल सकते. वो चूहे-बिल्ली का लुक्का छुपी का खेल तो आपको याद होगा ही उसकी शुरुआती धुन को सुनकर ध्यान उधर ही जाता था. एक एपिसोड ख़त्म होने के बाद बीच में जो ब्रेक आता था वो बहुत गुस्सा दिलाने वाला होता था. अगर कोई भी एपिसोड गलती से भी मिस हो जाता था तो मूड की ऐसी की तैसी हो जाती थी. वो प्यारा सा टॉम और छोटा सा चूहा जेरी कभी लड़ पड़ते थे तो कभी तीसरे बिल्ले को मज़ा चखाने के लिए एक हो जाते थे. सबसे प्यारा एपिसोड तो वो लगता है जिसमे तीसरा छोटा सा चूहा पूरे घर को तहस नहस कर देता है. और वो मोटी सी मालकिन आपको याद है जिसका चेहरा कभी भी नहीं दिखाया जाता था, कितना परेशान रहती थी इन चूहे बिल्ली के खेल से.पर अब शायद ये खेल हमारी यादों में ही जिंदा है क्योंकि उनके डायरेक्टर जोसफ बारबरा हमारे बीच नहीं हैं। उनके बाद किसी ने भी टॉम एंड जेरी के एपिसोड्स नहीं लिखे और इसकी लिखी गयी स्टोरीज किताबों में ही दफऩ हो गयी.आज कल तो कई और कार्टून्स को पर्दे पर लाया जा रहा है निंजा, हतौरी,डोरेमोन,शिन्चैन परमैन और भी बहुत सारे पर शायद ही ये सब टॉम एंड जेरी की बराबरी कर पाएं. मेरे लिए तो टॉम एंड जेरी नंबर वन है और रहेगा. आज कल के कार्टून्स में हंसी से ज्यादा वायलेंस भरा होता है. उसे देखकर छोटे बच्चो में इनोसेंस की जगह वायलेंस आ जाता है. टॉम एंड जेरी ने मुझे सिर्फ हंसाया है मेरे साथ मेरी पूरी फैमली मिलकर टॉम एंड जेरी देखती थी और शायद ही हमने इसका कभी कोई एपिसोड मिस किया हो. पर अब टॉम एंड जेरी के नए कार्टून्स हिस्ट्री का एक पार्ट बन गए हैं. वो कहीं जिंदा हैं तो यू ट्यूब पर. उसी को दख देख कर मन उदास हो जाता है . कहां वायलेंस से भरे कार्टून्स और कहां टॉम एंड जेरी जो बच्चों को खूब हंसाते थे। लेकिन ऐसे कार्टूनस बनाना बच्चों का खेल नहीं।
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