Sunday, 13 November 2016

वो बचपन वापस आ जाए!!

                 
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस खिलौने से खेल कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस समय को पीछे छोड़कर, 
कहाँ चले गये तुम बिन बताकर,
क्यों कहीं छुप के बैठ गये तुम मुझसे रूठकर.

काश आ जाए वापस वो खरगोश मेरा,
जिसे सुलाती थी मैं अपने बगल में लेटाकर,
न जाने कहाँ गया वो खरगोश मुझे छोड़कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ मैं उस खिलौने से खेल कर.

अब तो बस जीना है मुझे किताबों के अन्दर,
जीना चाहती हूँ मैं फिर से बचपन के अन्दर,
वापस आ जाए वो मेरा प्यारा बचपन,
फिर से जी लूंगी मैं उसे बच्चा बनकर.

                             


  

Journey of a happy life...!!!!

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