न जाने कितने समय या कहें सदियों से धरती माँ हम
पर मेहरबान हैं, क्या
कुछ नही किया है धरती ने हमारे लिए. उपजाऊ ज़मीन, पानी, हवा
सब कुछ हमें गिफ्ट में मिल चूका है, तभी हमारे समाज में धरती, वायु, जल और सूर्य
को इतना पूजा जाता है.
आज मुझे ऐसा लग रहा है की हमारी धरती माँ बीमार
हैं. यह लगना स्वाभाविक है. एक रात सोते सोते अचानक मेरी नींद खुली, कमरे में घुटन
सी महसूस हुई. खिड़कियाँ खुली थीं, फिर भी दम घुट रहा था. बरामदे में गयी तो वहां
धीमी- धीमी हवा से रहत महसूस हुई. मेरी घुटन का सबसे बड़ा रीजन था पॉल्यूशन. पॉल्यूशन तो शाम को भी था जब बाहर
घूमने गयी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों का धुंआ ही था. लगा थोड़ी देर के लिए भी
वहां रुकी तो बीमार पड़ जाउंगी. मुझे न सडकों पर न ही पार्कों में शुद्ध हवा मिली. तभी मुझे अहसास हो गया था कि हमारी
धरती माँ बीमार हैं. हम अपनी प्यारी धरती मां को घुट घुट कर जीने को मजबूर कर रहे
हैं. एक दिन आयेगा जब धरती की बर्दाश्त करने की क्षमता ख़त्म हो जाएगी और पृथ्वी के
साथ हम भी नहीं बचेंगे.
हम किस कदर अपने पर्यावरण से छेड़छाड़ कर रहें हैं
इसका उदाहरण धार्मिक अनुष्ठान और दूसरे कर्मकांड हैं. हम भगवान् से कामना तो सुख
समृद्धि की करते हैं लेकिन बदले में देते हैं ढेर सारा कचरा. हर साल की तरह फिर से
इस साल गणपति बाप्पा पधारे, 10 दिनों तक चलने वाले इस गणेश उत्सव की रौनक देखते
बनती थी. सुंदर सुंदर पंडालों में बाप्पा के आगे हाथ जोड़ कर आप ने भी कई
मनोकामनाएं की होंगी. दस दिन के बाद गणेश जी का नाचते गाते गुलाल उड़ाते हुए
विसर्जन हुआ. लेकिन अपनी मनोकामना पूरी करने के चक्कर में हमने नदियों में प्रदूषण
बढ़ा दिया. नदी में प्रतिमा छोड़ कर हम समझतें रहे हैं गणपति की कृपा होगी लेकिन
जहाँ वायु और जल प्रदूषित हो वहां कृपा कैसे बरस सकती है. नवरात्रि भी आने वाली
है.माँ दुर्गा हर पंडाल में कपूर की खुशबू के साथ विराजमान होंगी और 9 दिनों के
बाद सिन्दूर के साथ उनका भी विसर्जन हो जाएगा. और एक बार फिर मनमोहक मा की मूर्ती विसर्जन के बाद नदियों में पड़ी होंगी. फल
की कामना के बदले दुष्परिणाम हमारी नदियाँ भुगद रही होंगी. ज़रा सोचिए क्या ये
भगवान् का अपमान नही है, जिस भगवान् के आगे आपने हज़ारों मन्नतें मांगी, जिनसे
अगली बरस जल्दी आने का वादा लिया उनका ऐसे विसर्जन किया. अगर आप भगवान का सम्मान
सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए करते हैं तो उन्हें पंडालों में लाने का भी आपको कोई
अधिकार नही है. भगवान् को एक एंटरटेनमेंट का एक जरिया न बनायें. गणेश उत्सव और
नवरात्रि ईको फ्रेंडली बनायें खुद को और
दूसरों को भी खुली हवा में सांस लेने दें.
- तेजस्विनी ओझा, लखनऊ