Saturday, 23 November 2019

भभूत की वो राख

भटक-भटक मन भटका क्यों,
क्यों मन में ये ठहराव लगे,
हो प्रभु तुम्हारा ध्यान मन में,
तो सारी परेशानी भभूत की वो राख लगे।

लाख तकलीफें, डर, भय मन में,
सब मुझे अब क्षणिक लगे,
बोल तू बोल तू बोलता जा तू (इंसान),
तेरा अस्तित्व मुझे अब भभूत की वो राख लगे।

ये पैसा, ये रुतबा, ये प्यार ये सब मुझे अब छलावा लगे,
एक तू सच्चा, तेरा नाम ही सच्चा,
बाकी तो ये दुनिया मुझे भभूत की वो राख लगे।

-तेजस्विनी ओझा।

Journey of a happy life...!!!!

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