आज कल के यूथ में
आगे बढ़ने की होड़ मची हुयी है. हर कोई आगे बढ़ना
चाहता है कोई भी किसी से कम नहीं है. चाहे वो आपका बेस्ट
फ्रेंड ही क्यों न हो, उसके मन में एक सेकंड के लिए ये तो आता ही है की
वो अपने फ्रेंड से आगे निकल सके. किसी भी हालत में ऐसी
सिचुएशन में एक फिल्म का डायलाग याद आ जाता है- ‘दोस्त फेल होता है तो दुःख होता
है पर अगर दोस्त टॉप कर जाए तो उससे भी ज्यादा दुःख होता है’’. यह सभी यूथ का हाल
है. पर कभी कभी आपके पेरेंट्स की ऊँची पहुच भी आपको आपकी लाइफ में वो सब कुछ दिला
देती है जो शायद आप संभाल नहीं सकते या शायद जो आप डिज़र्व नहीं करते. अगर पेरेंट्स
एक बार ये सोच लेते हैं की भाई मेरा पुत्र या पुत्री तो डॉक्टर या इंजिनियर ही
बनेगा बस पर एक बार भी अपने बच्चे की सलाह लेना ज़रूरी नहीं समझते. अगर वो बच्चा
कोई एक्शन भी लेना चाहे तो उसे डाट कर चुप करा दिया जाता है और उन पेरेंट्स में तो
एक धुन सी लग जाती है और उसके लिए वो अपने आप को पूरा कंगाल करने के लिए भी तैयार
हो जाते हैं. पर क्या स्टूडेंट्स उस कोर्स को पूरा करने में सफल होते हैं? शायद
नहीं पर पेरेंट्स की पहुंच और ऊपर से जूनून है तो क्या-क्या नहीं कर सकते हैं.
अपने बच्चो के लिए कुछ करप्ट प्रिंसिपल्स और एचओडी इसका फायदा उठाकर और उन
पेरेंट्स से बड़ी रकम लेकर स्टूडेंट के आगे के इयर्स को सिक्योर करने का भरोसा दे
देते हैं... और जो बच्चे घिसट कर किसी तरह पास भी हो जाते हैं उनके पेरेंट्स ये
चाहने लगते हैं की मेरा बच्चा टॉप करे और उसके लिए डायरेक्टर की जेब में लाखों
करोड़ों भरकर अपने बच्चे को टॉप पे ले आते हैं पर क्या लांग रन में वो बच्चे सक्सेस
अचीव कर पाते हैं! शायद नहीं और अपनी पूरी लाइफ में फेलियर की भूमिका अदा करते
हैं...और जो मिडिल या लोअर क्लास के बच्चे होते हैं पढने में तेज़ इंटेलीजेंट और
डेसेर्विंग और सब कुछ पर शायद उनकी जगह वो अनडिसेर्विंग बच्चे ले लेते हैं और उन
बेचारे स्टूडेंट्स को फेल कर दिया जाता है जिसने टॉप करने के लिए अपनी जी जान लगा
दी थी...ये धांधली मेडिकल फ़ील्ड में सबसे ज्यादा देखने को मिलती है. पेरेंट्स अपने
बच्चे को टॉप में लाने के लिए घूस हैं और जो डेसेर्विंग बच्चा होता है वो फेल हो
जाता है. अब ये उन पेरेंट्स की सोच पर डिपेंड करता है की वो अपने बच्चे को सच का
हीरो बनाना चाहते हैं या नाकारा हीरो...सो थिंक पेरेंट्स...
Tuesday, 23 December 2014
Tuesday, 2 December 2014
बेटा पढ़ के सीधे घर आना
हर बच्चे की मां उसे स्कूल भेजने से पहले यही बोलती है की बेटा स्कूल में अच्छे से पढ़ाई करना और उसके बाद सीधा घर आना। पर उसे क्या पता है की जो बच्चे के लिए वो अपना खून पसीना एक करके पैसे जोड़ रही है, सुबह जल्दी उठकर उसके लिए लंच तैयार कर रही है, बच्चों को किसी चीज़ की कमी न हो, उसके लिए दिन रात ऑफिस में ख़ट रही है, वही बच्चा स्कूल बंक करके गलत रास्ते पर जा रहा है । क्या कभी एक मां ये बिलीव कर सकती है कि उसका बेटा या बेटी स्कूल टाइम में बाहर घूम रहे हैं। कल की ही बात है किसी काम से मुझे हजरतगंज जाना पड़ा तो देखा चार पांच स्टूडेंट्स जो 10 या 11 साल के होंगे, स्कूल ड्रेस में सिनेमा हॉल के बाहर मस्ती कर रहे हैं और स्मोकिंग कर रहे हंै। सामने पुलिस खड़ी है पर उनके चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं है। इस एज में आकर स्टूडेंट्स को लगता है की पेरेंट्स हमे नहीं समझते हम जो भी कर रहे हैं वो ही सही है बाकी सारी दुनिया उनकी दुश्मन है। अब आप ही इमेजिन करिये की पेरेंट्स को लगता है कि उनका बेटा स्कूल जाकर अच्छे से पढ़ाई कर रहा है अपने टीचर्स की रिस्पेक्ट कर रहा है। वही बच्चा अपने पेरेंट्स की सोच से उल्टा ही काम कर रहा होता है। मैं बात सिर्फ बंक करने वाले स्टूडेंट्स की ही नहीं कर रही। स्कूल में भी स्टूडेंट्स अपने टीचर्स को परेशान करते हैं। टीचर पढ़ाने क्लास में आते हैं तो पूरी क्लास ही खाली मिलती है। टीचर्स के पढ़ाते वक्त बच्चे आवाज़ निकालकर टीचर्स और पढऩे वाले बच्चों का कंसंट्रेशन तोड़ते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो स्टूडेंट फेल हो जाएंगे और उनका करियर पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। स्कूल के प्रिंसिपल भी इन बातों को अपनी मजबूरी बताते हैं। बच्चा स्कूल में मोबाइल ला रहा है , टीचर्स के फंकी वीडियो बना के नेट पर वायरल कर रहे हैं तो ऐसे स्टूडेंट्स को पटरी पर लाना काफी मुश्किल होगा।
पेरेंट्स को चाहिए की वो अपने बच्चे की हर एक्टिविटी पर ध्यान रखें। आई नो की पेरेंट्स के पास इतना समय नहीं होता है कि वो बच्चों पर ध्यान दें पर थोड़ा सा ध्यान देने की बात है तो सब नॉर्मल हो सकता है। रही टीचर्स और प्रिंसिपल की बात, तो अगर बच्चा 3 दिन से ज्यादा की छुट्टी लेता है तो वो तुरंत स्टूडेंट के पेरेंट्स को कॉल करें पुलिस भी ध्यान रखे कि अगर बच्चा स्कूल टाइम में बाहर घूमता हुआ मिले तो तुरंत प्रिंसिपल को या उस बच्चे के पेरेंट्स को बताएं बट तबतक इस भयंकर सिचुएशन का क्या होगा ये सोचने वाली बात होगी.
पेरेंट्स को चाहिए की वो अपने बच्चे की हर एक्टिविटी पर ध्यान रखें। आई नो की पेरेंट्स के पास इतना समय नहीं होता है कि वो बच्चों पर ध्यान दें पर थोड़ा सा ध्यान देने की बात है तो सब नॉर्मल हो सकता है। रही टीचर्स और प्रिंसिपल की बात, तो अगर बच्चा 3 दिन से ज्यादा की छुट्टी लेता है तो वो तुरंत स्टूडेंट के पेरेंट्स को कॉल करें पुलिस भी ध्यान रखे कि अगर बच्चा स्कूल टाइम में बाहर घूमता हुआ मिले तो तुरंत प्रिंसिपल को या उस बच्चे के पेरेंट्स को बताएं बट तबतक इस भयंकर सिचुएशन का क्या होगा ये सोचने वाली बात होगी.
Friday, 14 November 2014
क्या यही है बाल दिवस??
आज चिल्ड्रेन्स डे है हर बच्चा ख़ुशी ख़ुशी स्कूल की तरफ जा रहा है। कलरफुल ड्रेस में हाथ में गुलाब लेकर हर बच्चे के चेहरे पर बड़ी सी स्माइल है। स्कूल जाकर दो घंटे का रिसेस ब्रेक पूरा दिन ग्राउंड में क्रिकेट, बैडमिंटन, ऑडिटोरियम में एक्स्ट्रा कलिकुलर एक्टिविटीज कोई रोक टोक नहीं। टीचर्स के साथ प्यारी प्यारी पिक्स और उसके बाद घर। कितना प्यारा शेड्यूल है। इसे सोचकर तो ऐसा लग रहा है कि काश हम फिर से बच्चे बन जाएं।पर टीवी देखकर के मन फिर से खराब हो गया चाइल्ड लेबर की कुछ फोटो टीवी पर दिखाई गयीं जिसपर बच्चों को भूखा प्यासा फुटपाथ पर मारा जाता है और सुबह ज़बरदस्ती उठाकर धंधे में लगा दिया जाता है । ठण्ड में ढंग के कपडे भी नहीं और भूखे बच्चे ज़बरदस्ती काम या धंधे में ठेले जाते हैं और अगर गलती से भी कोई काम गलत हो या कोई चीज़ गलती से भी टूट जाए तो उनको फिजिकली और मेंटली टार्चर किया जाता है। जिससे उनके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ता है। प्लस काम के बदले में उन्हें न तो कपडे ढंग के मिल पाते हैं और न ठण्ड की रात गुज़ारने के लिए जगह। इंडिया में लगभग 27 लाख बच्चे चाइल्ड लेबर का शिकार हैं । यहाँ उन बच्चों को काम दिया जाता है जिनके पेरेंट्स ने ओनर से कर्र्ज ले रखा हो या उन बच्चो को गिरवी रखा गया हो।
मैं बात सिर्फ बाल मजदूरी की ही नहीं कर रही हूँ , मैं उन बच्चों की भी बात कर रही हूँ जो स्टूडेंट्स हैं पर उनका मिडिल क्लास या लोअर मिडिल क्लास का होने की वजह से उन्हें भी रोज़ इस मेंटल और फिजिकल टार्चर से गुजऱना पड़ता है। अभी कल ही टीवी में देखा एक छोटा सा 12 साल का बच्चा बीमार होने की वजह से स्कूल नहीं आ पाया तो टीचर उसे पहले प्रिंसिपल के पास ले गए । उन्होंने उसे प्यार से समझाने के बजाये लोहे की रॉड से इतना मारा की उसके हाथ पैर नीले हो गए और फिर जब वो बच्चा क्लास पंहुचा तो क्लास टीचर ने भी उसे लकड़ी के स्केल से इतना मारा की बच्चा वहीं बेहोश हो गया और उसे ये भी धमकी मिली की खबरदार घर में जाकर कुछ बताया, मैं तुम्हारे माँ बाप से नहीं डरता हूँ....उसके बाद वो बच्चा इतना ज्यादा डर गया की उसने ऐसा कदम उठाया की आज वो बच्चा हमारे बीच नहीं है । पर पेपर पर उसने उन टीचर्स के नाम लिखे जिन्होंने उस बच्चे को एब्यूज किया अब देखते हैं उन घटिया मेंटालिटी के टीचर्स को इसकी क्या सजा मिलती है । और अब आपको आगे आने की ज़रुरत है ताकि बच्चा अपने पेरेन्ट्स से अपनी परेशानी शेयर कर सके और उसे इतना मेंटल टार्चर न झोलना पड़े। अब आप पूरा दिन अपने आप से पूछिए की क्या यही है बाल दिवस?
तेजस्विनी ओझा उपमन्
यु
Saturday, 8 November 2014
मुझे झाड़ू लगाते टीवी पर देखा क्या?

आज कल पूरे देश में सफाई अभियान ज़ोर शोर से चल रहा है। हमारे ऑनरेबल पीएम अंकल ने भी काफी देर तक झाडू लगाईं थी सडक़ों पर। अगर आप
देखें तो टीवी और रेडियो पर भी साफ़ सफाई की मुहिम छिड़ी हुयी है। हर कोई अपने आसपास सफाई रखने पर जोर दे रहा है। हमारे देश के कुछ क्रिकेट के चैंपियंस तो सुबह 4 बजे उठकर सफाई कर रहे हैं। और तो और जिन एक्टर्स और एक्ट्रेसेस को हमलोग सेल्फ सेंटर्ड कहते हैं वो भी अपने इंडिया
की सफाई के लिए आगे आ रहे हैं । चाहे कोई भी हो, पोलिटिकल पार्टीज के नेताओं
के हाथ में भी आपको झाडू दिखेगा। पर शायद कुछ लोग ऐसे हैं जो एक ही जगह
बार बार घूम घूम के झाडू लगा रहे हैं और कुछ तो ऐसे हैं की जहां भी कैमरा
दिखे वहां अपनी झाडू लिए शुरू हो जाते हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले टीवी पर
देखा कि दो लोग टीवी पर आने के लिए झाडू लगा रहे थे । इसी बीच उन
दोनों में लड़ाई हो गयी और अपनी अपनी झाडू उठाकर लडऩे लगे। उन्हें ये
नहीं पता था की यही लड़ाई टीवी पर आ जायेगी और वो हंसी के पात्र बन जाएंगे।
आप ही सोचिये की ये तो कोई सफाई नहीं हुयी जबकि आप टीवी पर आने के
लिए ऑलरेडी साफ़ जगहों पर झाडू लगा रहे हो। ये लोग तो सिर्फ अपनी
पब्लिसिटी करने के लिए ही साफ़ जगहों पर झाडू लगा रहे हैं(जो जनता को दिख
भी रहा होता है)। हद तो तब हो जाती है जब दो गुटों में टीवी पर आने की
उत्सुकता की वजह से जूते चप्पल चल जाते हैं । और वो खबर सीधे टीवी में
ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती हैं। पर ये क्या बात हुयी आपका इरादा तो टीवी पर आने का था वो पूरा तो हो जाता है पर जिन लोगों से आप अपनी तारीफ़ कराना चाहते हो वो लोग आप पर उल्टा हाथ दिखाकर हँसना शुरू कर देते हैं।
अब आप ही बताइये की क्या ऐसे हम अपनी कंट्री को सुधार सकते हैं? क्या इन
छोटी छोटी बातों पर लाठी डंडे या जूते चप्पल चला कर हम अपनी कंट्री को
साफ़ कर पाएंगे? क्या हमारी अपनी आस पास गंदगी फैलाने की मानसिकता कभी
बदल पाएगी? पर चलिए हमारे देश में कुछ ऐसे भी लोग
हैं जिनको अपने आस पास कैमरा न होने से कोई फर्क भी नहीं पड़ता। वो सिर्फ
अपनी कंट्री को साफ़ देखना चाहते हैं और ये विश ज़रूर पूरी होगी उनकी अगर
पूरी कंट्री उनका साथ दे तो।...तबतक आप थोडा झाडू लगाइए पर ये मत बोलिएगा
की मुझे झाडू लगाते टीवी पे देखा क्या ?
Sunday, 12 October 2014
अब इस रावण की जलने की बारी..!
कुछ ही समय पहले हमने धूम-धाम से दशहरा मनाया, बड़े-बड़े रावण के दस सिर वाले पुतले के अन्दर खूब सारे पटाखे रख कर जलाए, रामलीला का आयोजन और फिर चाट और आइस्क्रीम के साथ थोडा सा एंजोयमेंट और वापस अपने काम पर. स्मगलर, चा उचक्के डकैत, फ्रॉड, बेईमान, मनचले, सब लग जाते हैं अपने ध्ंाधे में। अब आप ही बताइये की इन रावणों का कब दहन होगा, कब हमारा देश इन सब से पूरी तरह से आज़ाद हो पायेगा। ये सोचने वाली बात है। आप चाहे कितने भी रावण फूको, कितनी भी पूजा पाठ या हवन करो, आपके पापों का घड़ा तो ऐसे खाली नहीं होगा। अगरकोई भिखारी आपसे 1 रुपए भी मांगता है तो आप दुत्कार के उसको भगा देते हो, वहीँ जब बड़ा मंगल आता है बड़ा सा पंडाल लगाकर भंडार कर भगवान को बेवकूफ बनाने की कोशिश करते हो ताकि आपका पापों का हाफ घड़ा तो खाली कर ही सकें। ये तो छोटे मोटे रावण हैं । अब बात होगी बड़े रावणों की तो लोगों की शांति भंग करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं वो हैं ये हैकर्स वो लोगों की आईडी हैक करके लोगों की पिक्स का मिसयूज करते हैं उनकी फोटोज सेव करके उनकीफेक आईडी बनाकर लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं। उनसे फ़्लर्ट करते हैं, बहकाते हैं। यहां सिर्फ आईडी हैकर्स की ही बात नहीं हो रही है बल्कि बात हो रही है बैंक अकाउंट हैकर्स की जो लोगों के बैंक अकाउंट से सारा पैसा निकालकर गलत धंधे करते हैं। हमारे देख में एक और तरीके के भी रावण हैं और वो हैं आज कल के बाबाजी..जो लोगों को फंसाकर अपना उल्लू सीधा करते है- पुत्र ये अंगूठी पहनो तुम्हारा कल्याण होगा, पुत्र आखिरी बार समोसा कब खाया था खा लो धन की वर्षा होगी। लोगों को बेच खाने में इनको आनंद मिलता है ऐसे ही कुछ बाबा आज जेल की सलाखों के पीछे हैं और चाह कर भी हाथ पैर मारकर भी बाहर नहीं आ पा रहे। चलिए अगर आप कोई बाबाजी को मानते हैं तो ये आपकी श्रद्धा है मैं उसमें कुछ नहीं कर सकती पर एक दिन ऐसा आएगा की आप सिर्फ पछताएंगे। ध्यान रखिये की इनको लोगों को अपनी भोली बातों में लोगों को फसाने में डिग्री हासिल है ये किस तरह से आपके लिए ट्रैप बिछायेंगे और आप इसमें फंसते चले जाएंगे और आपको पता भी नहीं चलगे सो प्लीज थोड़ा सा सावधानी बरतिए...
अब इन रावणों का दहन कैसे होता है ये सोचने वाली बात है और इन रावणों का दहन करने के लिए कौन भगवान् राम बनकर आता है ये आगे आने वाला टाइम ही बताएगा।
रावण की जलने की बारी..!
Sunday, 28 September 2014
आखिर गलती किसकी ??
पिछले दिनों एक सुबह न्यूज़ देखी तो रोंगटे खड़े हो गए। एक लडक़ा पता नहीं कैसे दिलली जू में बाघ के बाड़े के अन्दर घुस गया...जहां वो बाघ के सामने हाथ-पैर जोडक़र बैठा हुआ था करीब दस मिनट। पर बाघ पर उसका को असर नहीं और आखिर में बाघ ने उसे मार ही डाला। अब सवाल ये है की गलती किसकी है - लडक़े की, जू ऐडमीनिसट्रेशन की या बाघ की पर शायद बाघ की कोई गलती नहीं है। वो उस लडक़े को शायद छोड़ देता अगर लोग उसपर पत्थर न फेकते। पत्थर फेकने की वजह से वो
बाघ और भडक़ गया और उसने गुस्सा लडक़े पर उतारकर उसका दी एंड कर दिया। प्रशासन से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा की बोर्ड पर साफ़ साफ़ चेतावनी लिखी गयी है पर फिर भी शायद फोटो खीचने के चक्कर में वो लडक़ा बाड़े के बहुत पास चला गया और बैलेंस न कर पाने की वजह से वो अन्दर गिर पड़ा।
सिर्फ यही इंसिडेंट नहीं आज कल तो शेर और बाकी जंगली जानवर गाँव में घुस आते हैं और खेतों में काम कर रहे लोगों को मार देते है और गाँव के लोग अगर शेर को पकड़ भी लेते हैं तो वन विभाग के हवाले करने के बजाये उस शेर को पीट- पीट के मार डालते हैं। यहीं मेन कारण है की शेरों की संख्या में बहुत तेज़ी से कमी आ रही है। शेरों के भाग कर शहर आने में भी हमारी ही गलती है। हम लोग जंगलों को काट रहे हैं इसी वजह से जंगली जानवर भाग-भाग के गाँव और शेहेरों की तरफ रुख कर रहे हैं। आखिर दोषी है कौन? सब तो अपनी रिसपॅान्सीबीलीटीज से पल्ला झाड़ रहे हैं पर शायद ये सब गलती हमलोगों की ही है। न हमलोग जंगल काटते, न शेर शहर में आता न गाँव के लोग उसे पकड़ते और न ही उसकी पीट-पीट कर हत्या होती।
सिर्फ यही इंसिडेंट नहीं आज कल तो शेर और बाकी जंगली जानवर गाँव में घुस आते हैं और खेतों में काम कर रहे लोगों को मार देते है और गाँव के लोग अगर शेर को पकड़ भी लेते हैं तो वन विभाग के हवाले करने के बजाये उस शेर को पीट- पीट के मार डालते हैं। यहीं मेन कारण है की शेरों की संख्या में बहुत तेज़ी से कमी आ रही है। शेरों के भाग कर शहर आने में भी हमारी ही गलती है। हम लोग जंगलों को काट रहे हैं इसी वजह से जंगली जानवर भाग-भाग के गाँव और शेहेरों की तरफ रुख कर रहे हैं। आखिर दोषी है कौन? सब तो अपनी रिसपॅान्सीबीलीटीज से पल्ला झाड़ रहे हैं पर शायद ये सब गलती हमलोगों की ही है। न हमलोग जंगल काटते, न शेर शहर में आता न गाँव के लोग उसे पकड़ते और न ही उसकी पीट-पीट कर हत्या होती।
Sunday, 7 September 2014
अल्ले भाई हम भी फेच्बूक पल हैं
आज आप देखेंगे हर कोई फेसबुक का इस्तेमाल करता है। इवेन कैंटीन चलाने वाले भी बड़ी होशियारी से फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। आज किसके-किसके हाथों में मोबाइल फ़ोन है आप इमेजिन ही नहीं कर सकते हो। आजकल की हाई प्रोफाइल फॅमिली अपने स्टेटस का शो ऑफ करने के लिए नए फोंस नए लैपटाप्स का इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में छोटे बच्चे भी पीछे नहीं हैं। वो बच्चे जो अभी सिर्फ 9 या 10 साल के होंगे, उनके हाथ में आप नए और महेंगे आई फोंस देख सकते हैं। पेरेंट्स भी आँख मूंदकर अपने बच्चो को फ़ोन दे देते हैं और बच्चे पहले गेम्स खेलेंगे फिर नेट पे डाउनलोडिंग करेंगे फिर धीरे से फेसबुक पर पहुँच जाएंगे और दुनिया भर के लोगों को ऐड करेंगे जिनको वो शायद जानते ही नहीं हैं। बच्चो को नहीं पता चलेगा और उनकी फॅमिली की सारी पर्सनल बातें उन लोगों को पता चल जाएंगी जो लोग उस बच्चे को या उसकी फॅमिली को जानते तक नहीं हैं। आप ही बताइये ये कितना सेफ है? अनजान लोगों के कांटेक्ट में आना सबसे खतरनाक है। पर ये गलती सिर्फ बच्चों की नहीं है बल्कि उनके पेरेंट्स और सोशल नेटवर्किंग के वेब डेवलपर्स की भी है की कुछ स्टेप्स को फॉलो करके कोई भी अपनी आईडी आराम से बना सकता है। उम्र बंधन का कोई फायदा भी नहीं है क्योंकि कोई भी अपनी एज बढ़ाकर लिख सकता है। पर सवाल ये उठता है की आप कितने सेफ हो। कुछ पेरेंट्स जो जानकर भी अपने बच्चे को फेसबुक अकाउंट बनाने की परमीशन दे देते हंै पर यह नहीं देखते की बच्चा उसका कैसा इस्तेमाल कर रहा है, किसको ऐड कर रहा है, किससे चैट कर रहा है। मैं बात सिर्फ फेसबुक की ही नहीं, आज यू ट्यूब भी खतरे से खाली नहीं है। कोई कैसे उसका इस्तेमाल कर रहा है, उसकी कोई जानकारी आपतक नहीं पहुच पाएगी और आप रियलिटी में बेखबर रहेंगे। आज कल की जेनरेशन इतनी आगे बढ़ चुकी है की आप सिर्फ सोचते रहेंगे और कोई भी बच्चा वो काम फटाक से कर के दिखा देगा। यहाँ तक की 6-7 साल के बच्चो को हिस्ट्री क्लियर करना भी बहुत आराम से आता है। मेरा यह मतलब नहीं कि इन्टरनेट पूरी तरह से यूजलेस है। इन्टरनेट पर आप बहुत सी इनफार्मेशन, जैसे अपनी अर्थ के बारे में, अपनी आगे की एजुकेशन के लिए टिप्स भी सर्च कर सकते हो। बट शायद छोटे बच्चों को सिर्फ सोशल नेटवर्किंग साइट्स के बारे में सबसे ज्यादा पता होता है और वो बहुत जल्दी इसकी तरफ अपना ध्यान लगा देते हैं जो उनकी लाइफ के लिए और इवन उनकी हेल्थ के लिए भी ठीक नहीं है। अगर कोई भी पैरेंट अपने बच्चे को ज्यादा एफबी यूज करने के लिए मना करता है तो बच्चो को इतना तेज़ गुस्सा आता है कि वो भूल जाते हैं की हम अपने बड़ों से बात कर रहे हैं। वो बच्चे ये भी नहीं समझ पाते की हम क्या बोल रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है की फेसबुक आई.डी बनाना इतना आसान है कि कोई भी आराम से बना सकता है। फटाफट आपकी आईडी बनकर तैयार हो जायेगी। वेब डेवलपर्स को चाहिए की इस स्टेप को और मुश्किल किया जाए ताकि छोटे बच्चे इससे बच सकें और उनकी लिए में इससे रिलेटेड कोई प्रॉब्लम न आ सके। Sunday, 31 August 2014
मैडम मैंने किया क्या है?
आज मैंने मम्मी से एक सरदार जी की कहानी सुनी...ये बात मम्मी के चाइल्डहुड से है। एक सरदार बच्चा जो दूसरी क्लास में पढ़ता था और मम्मी का क्लासमेट था। बहुत ही सीधा सादा । एक दिन वो अपने पापा के साथ मम्मी की कॉपी से होमवर्क उतारने आया क्योंकि उसको ब्लैक बोर्ड से उतारकर लिखने में प्रॉब्लम होती थी। मम्मी को उसका चेहरा अब भी याद है। एक कोने बैठकर वो चुप चाप काम कर रहा था। मेरे नानाजी और उनके पापा अच्छे दोस्त थे। अगले दिन जब मेरी मम्मी स्कूल गयीं तो उन सरदार जी अंकल ने कहा कि गरिमा तू मेरे साथ बैठा कर। उसके बाद से ही मम्मी ने उनके साथ बैठना शुरू कर दिया और वो अंकल बहुत ही सिक्योर और सेफ फ़ील करता था। एक बार मम्मी का सोशल स्टडीज का पीरियड था उस समय स्कूल बैग्स का प्रचलन नहीं था उस समय सूट केस टाइप का बॉक्स होता था जिसमें बच्चे अपनी सारी चीज़ें रखते थे। एक बार सबसे आगे बैठा वो बच्चा बार-बार अपना केस खोलकर चीज़ें निकाल रहा था। उसके उस केस पर सूरज की रौशनी पड़ रही थी और उसकी डायरेक्ट रौशनी वहां मौजूद टीचर के चेहरे पर पडऩे लगी। उस टीचर को इतना गुस्सा आया कि उनको बहुत मारा वो सिर्फ सिसक-सिसक कर रो रहे थे और उनकी आगे कुछ कहने ही हिम्मत ही नहीं पड़ी। अब आप इमेजिन करिए की किसी छोटे बच्चे को बुरी तरह से पीटना क्या सही है और बेचारा बच्चा ये सोच ही नहीं पा रहा की उसकी गलती क्या है.... फिर क्लास थर्ड में उनके पापा का ट्रान्सफर चंडी गढ़ से कहीं और हो गया और वो हमेशा के लिए चले गए। सोच सोच कर ही कितना गुस्सा आता है की पहले के समय में ऐसे टीचर्स होते थे जो बच्चो को इतनी बुरी तरह से पीटते थे की उनका हाथ पैर सूज जाते थे। धूप में खड़ा करना, क्लास में बेंच के ऊपर खड़ा करना ये सब उस समय पनिशमेंट के तरीके थे। टाइम बीत गया और अब तो ये नीयम बना दिया गया है कि अगर किसी टीचर ने स्टूडेंट्स की पिटाई की तो उसका सीधा असर टीचर और प्रिंसिपल करियर पर पड़ेगा। काश पहले के ज़माने में भी कोई ऐसा नीयम होता तो शायद वो अंकल पिटाई से बाच जाते। अब तो ऐसा टाइम आ गया है की अगर बच्चे को थोड़ी सी भी डाट पड़े तो वो जाकर अपने पेरेंट्स को सब बताता है। कुछ हद तक गलती पेरेंट्स की भी है की वो ध्यान ही नहीं दे पाते थे की कहीं बच्चे को कोई प्रॉब्लम फेस तो नहीं करनी पड़ रही? कहीं मेरे बच्चे को उस चीज़ की पनिशमेंट तो नहीं मिल रही जो गलती उसने की ही नहीं है? पर टाइम बीतते देर नहीं लगती आज कल के पेरेंट्स बहुत धान रखते हैं- बच्चा किस तरह के फ्रेंड्स बना रहा है, कहीं टीचर्स उसे कुछ कह तो नहीं रहे बच्चो की रोज़ स्कूल डायरी चेक करना, उसे एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में पर्टिसिपेट कराना, पढ़ाना सब कुछ पेरेंट्स की निगरानी में होता है। पर काश उस समय भी ये सब अवेयरनेस होती तो शायद उन अंकल के साथ ये सब कुछ नहीं होता और शायद आगे कोई बच्चा ये न कहे की मैडम मेरी गलती क्या है??
Monday, 11 August 2014
बच्चों की जान जोखिम में..!
स्कूल वाहनों की दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं.
लेकिन आजकल पेरेंट्स कितने बिज़ी होते की उनके पास अपने बच्चों को स्कूल
छोडऩे का भी टाइम नहीं मिलता. वैसे तो पेरेंट्स स्कूल वैन और बसेस पर
भरोसा करते हैं पर उनको नहीं पता कि ऐसा करके वो अपने बच्चों को
इनडायरेक्टली जोखिम में धकेल रहे हैं. खैर इसमें गलती पेरेंट्स की भी नहीं
है। चुप-चाप बच्चों को वैन में बैठाया, हाथ हिला के बाय किया और वापस घर या
अपने ऑफिस की तरफ बढ़ जाते हैं। पर उनको स्कूल वैन या बस के अन्दर के
हालात की खबर नहीं होती है. आज आपको बताते हैं कि इन वाहनों में किस हालात
से बच्चे गुजऱते हैं. जो स्कूल वैन्स या आटो आपको सडक़ों पर दौड़ते दिखते
हैं, वो बाहर से तो अच्छे दिखती है पर अन्दर के हालात कुछ और होते हैं.
अधिकतर स्कूल वैन्स की सीटें खराब होती हैं, स्प्रिंग्स और कीलें निकली
होती हैं. उसमें बच्चों को ठूंस दिया जाता है जिससे कभी हाथ में चोट लगती
है कभी कपड़े फट जाते हैं. इन वैन्स में फस्र्ट एड का भी कोई इंतजाम नहीं
होता. हाइजीन की भी कोई चिंता नहीं रहती. इसके ड्राईवर मुंह में गुटखा
ठूंसे रहते हैं. कही भी सिगरेट-बीड़ी पीने लगते हैं, जिसका स्टूडेंट्स के
हेल्थ पर बुरा असर पड़ता है. आप बिलीव नहीं करेंगे पर कुछ स्कूल वैन में
सीएनजी के 1 नहीं 2-2 सिलिंडर खुले में लगे रहते हैं जिससे कभी भी कोई बड़ा
एक्सीडेंट हो सकता है. टचवुड ऐसा कभी न हो.बच्चे इस कदर गाडिय़ों में ठुसे
रहते हैं की क्रॉस वेंटिलेशन तो क्या सांस लेने की भी जगह नहीं रहती. अगर
बात की जाए इने फिटनेस सर्टिफिकेट की तो अभी तक ज्यादातर वाहन फिट नहीं
होते हैं लेकिन चेकिंग न होने से इनकी चांदी है. न आरटीओ इसकी जांच करता है
और न ही ट्रैफिक पुलिस को कोई परवाह है..सिटी में इस समय करीब 175स्कूल
बसेस हैं और 528 स्कूल वैन्स जबकि आरटीओ ऑफिस के आंकड़ों में 108 बसें और
322 स्कूल की वैंस ही रजिस्टर्ड है अब आप आप ही अंदाज लगा सकते हैं कि
बच्चों की जिंदगी के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है. अब ये आपको तय करना
है की क्या सही है और क्या गलत.
Monday, 14 July 2014
मशीनों की दादागीरी
आज के ज़माने में टेक्नालॉजी काफी एडवांस हो गयी है। जैसे टाइप करने के लिए टाइपराइटर या क्म्प्यूटर। लैपटॉप्स पर ज्यादा से ज्यादा ऑफिशियल काम निपट जाते हैं, पर पहले के ज़माने में हाथ से लिखना पड़ता था। बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में भी बड़ी बड़ी मशीनों की ज़रूरत पड़ती है। आपने एक बात पर ध्यान दिया है कि मशीनों की वजह से मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं क्योंकि एक मशीन सौ मजदूरों का काम कर रही है। उनकी हाथ की मेहनत को तो मशीनों ने हड़प लिया अब बेचारे मजदूर क्या करें। जो काम हो 2 दिन में करते थे मशीनों ने वो काम आधे दिन में ही पूरा कर दिया तो ठेकेदारों ने मजदूरों को की छटनी कर दी। अब बेचारे जाए तो जाएँ कहाँ। फुल ऑन वाट लगा दी है मशीनों ने। इसलिए बेचारे गलत काम कर रहे हैं ताकि दो वक्त की रोटी खा सकें। पर कर भी क्या सकते हैं सारा काम तो मशीने ही कर देती हैं। एक समय तो ऐसा आएगा जब बिल्डिंग बनाने का सारा काम भी मशीने करेंगी। और बेचारे मजदूर हाथ मलते रह जाएंग। सिर्फ मजदूर ही नहीं हम भी मशीनों पर पूरी तरह डिपेंडेंट हो गए हैं। आँख खुलते ही सबसे पहले मशीनों का दर्शन होता है । सारा दिन मशीनों पर ही शुरू होता है और उसपर ही ख़तम होता है...अपनी मेहनत से काम ही नहीं करते गेहूं पीसने के लिए मशीन का इस्तेमाल, चि_ी पोस्ट बॉक्स में डालने से अच्छा है कि मेल कर दो। सारा झंझट ही ख़तम। मुझे पता है कि मशीने हमारी काफी हेल्प करती हैं बट उनपर पूरी तरह डिपेंडेंट रहना ठीक नहीं है। इसके कुछ पॉजिटिव और कुछ नेगेटिव इफेक्ट्स होते है जो आप ही सोचकर मुझे बताइये पर मेरे हिसाब से 50 परसेंट पॉजिटिव और 50 परसेंट नेगेटिव इफेक्ट्स हमारे सामने मौजूद हैं पर ये आपको ही समझना पड़ेगा की क्या नेगेटिव हैं और क्या पॉजिटिव...तब तक चलाते रहिए मशीन..
Sunday, 6 July 2014
जय हो 3G
इतनी शक्ति हमे दे न DATA,
CELL का SIGNAL कमज़ोर हो ना ,
हम रहे RANGE में हर कदम पर
भूल कर भी हम OFFLINE हो ना.... :) :D :)
CELL का SIGNAL कमज़ोर हो ना ,
हम रहे RANGE में हर कदम पर
भूल कर भी हम OFFLINE हो ना.... :) :D :)
Friday, 4 July 2014
सर्व अशिक्षा अभियान..?
आप ये साेचेंगे की मैंने इसका नाम क्यों बदला। सर्व शिक्षा अभियान बहुत सारी होप के साथ ये नाम रखा गया था कि सब बच्चों को शिक्षा मिले पर ये नाम शायद अब भ्रष्टïाचार की भेंट चढ़ गया है। आज मैं सरकार या प्लानिंग को दोष नहीं दे रही। मेरा सवाल टीचर्स की कमी पर उठा है। टीचर्स की अभी तक नियुक्ति भी नहीं हुयी है और उसका इफ़ेक्ट बच्चों के करियर पर पड़ रहा है बच्चों के स्कूल खुल गए या खुलने वाले हैं। बच्चों को लग रहा है की कब स्कूल खुलें और हम नयी-नयी किताबों के साथ सेशन शुरू करें पर उन बच्चो को ये भी नहीं पता है की अभी तक उनके सब्जेक्ट टीचर्स ही नहीं तय हुए है । तय होना तो दूर उनका अभी तक अपोइंटमेंट ही नहीं हुआ है। अभी तक 31,000 टीचर्स की नियुक्ति होना बाकी है ऐसे में बच्चे
एक सर्वे में मालूम पड़ा की 2011 से 72,825 टीचर्स का चयन ही नहीं हुआ है। वो टीचर्स क्या सब्जेक्ट पढाएंगे इसका बुरा असर उन बच्चो के करियर और उनकी इस सेशन की पढ़ाई पर पड़ रहा है। ये बात आपको सुनने में थोड़ी कड़वी लगेगी पर यही कारण है कि बच्चों को अच्छे नंबर नहीं मिल रहे है और उनका साल बरबाद हो रहा है। अब ये आप पर डिपेंड करता है की आप किसको कोसते हैं बच्चो को या टीचर्स को जिनको बच्चों के फ्यूचर से कोई लेना-देना है नहीं है।
ऐसे तीन सब्जेक्ट्स हैं जिसमें बच्चो को सबसे ज्यादा हेल्प की ज़रुरत होती है वो सब्जेक्ट्स हैं मैथ्स, इंग्लिश और हिंदी। आपको देखकर हैरानी होगी की इन्ही तीन सब्जेक्ट्स में सबसे कम टीचर्स हैं क्युकी ऐसा सब्जेक्ट्स के लिए टीचर्स पढ़ाने के इच्छुक ही नहीं है। तो बताइये आप की अगर इतनी बेकार प्लानिंग होगी तो सर्व शिक्षा अभियान, सर्व अशिक्षा अभियान तो ज़रूर ही बनेगा। ज़रुरत है तो अच्छे प्लानिंग और अच्छे एजूकेशन सिस्टम की।
स्कूल जाकर क्या करेंगे ये सोचने वाली बात है।
एक सर्वे में मालूम पड़ा की 2011 से 72,825 टीचर्स का चयन ही नहीं हुआ है। वो टीचर्स क्या सब्जेक्ट पढाएंगे इसका बुरा असर उन बच्चो के करियर और उनकी इस सेशन की पढ़ाई पर पड़ रहा है। ये बात आपको सुनने में थोड़ी कड़वी लगेगी पर यही कारण है कि बच्चों को अच्छे नंबर नहीं मिल रहे है और उनका साल बरबाद हो रहा है। अब ये आप पर डिपेंड करता है की आप किसको कोसते हैं बच्चो को या टीचर्स को जिनको बच्चों के फ्यूचर से कोई लेना-देना है नहीं है।
ऐसे तीन सब्जेक्ट्स हैं जिसमें बच्चो को सबसे ज्यादा हेल्प की ज़रुरत होती है वो सब्जेक्ट्स हैं मैथ्स, इंग्लिश और हिंदी। आपको देखकर हैरानी होगी की इन्ही तीन सब्जेक्ट्स में सबसे कम टीचर्स हैं क्युकी ऐसा सब्जेक्ट्स के लिए टीचर्स पढ़ाने के इच्छुक ही नहीं है। तो बताइये आप की अगर इतनी बेकार प्लानिंग होगी तो सर्व शिक्षा अभियान, सर्व अशिक्षा अभियान तो ज़रूर ही बनेगा। ज़रुरत है तो अच्छे प्लानिंग और अच्छे एजूकेशन सिस्टम की।
स्कूल जाकर क्या करेंगे ये सोचने वाली बात है।
Monday, 30 June 2014
ऐसे कैसे सुधरेंगे बच्चे?
बाल सुधारगृह बच्चों को सुधारने के लिए बनाए जाते हैं पर सुधारगृह में ऐसा क्या होता है कि बच्चे वहां से भागने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चे सुधार गृह में इसलिए आते हैं ताकि जो क्राइम उन्होंने किये हैं वो आगे न करें इसलिए उन्हें सुधारघर में भेजा जाता है पर वहाँ का महौल ऐसा होता है कि बच्चे सुधार घर छोड़-छोड़ कर भाग रहे हैं। उनका शोषण होता है। सफाई का काम भी उनसे ही कराया जाता है। बच्चा सुधार घर में जाकर सुधरने के बजाय और बिगड़ जाता है। वहां के कर्मचारी उन बच्चों से बहुत बुरा बर्ताव करते हैं। अच्छा खाना और रहने की व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए वाहीं कर्मचारी बच्चों से सुधार घर का सारा काम कराते हैं जिससे मजबूरन बच्चों को भागना पड़ता है। और दूसरी बात सफाई का ध्यान बहुत कम रखा जाता है । कहीं छत टपकती है तो कहीं सीलन से बुरा हाल होता है। काम न करने पर बच्चों की पिटाई की जाती है। जिससे बच्चों का जीना दुश्वार हो जाता है। वहां के कर्मचारियों को लगता है की इन बच्चों ने किसी न किसी तरह का अपराध किया है, ये बच्चे कभी सुधर ही नहीं सकते। इसी मानसिकता के साथ वो बच्चों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करते हैं और बच्चों पर थर्ड डिग्री टॉर्चर होता है। जो पैसा बच्चों के लिए आता है उन्हें अधिकारी अपनी जेब में कर लेते हैं। ऐसे में बच्चों में कैसे सुधार आएगा? काश उन्हें सदबुद्धि आए।
Tuesday, 24 June 2014
स्मार्टफोन…? धिसते रहिए अंगूठा
जैसे ही स्मार्टफोन का नाम लेते हैं तो
ऐसा लगता है की वो कह रहा है “स्मार्टफोन नाम तो सुना होगा’...क्युकी
अब स्मार्टफोन की ऐसी आदत लग चुकी है की इससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल है। अभी ही
स्मार्टफोन की इतनी खुमारी है तो ये सोचिये की आगे जाकर क्या हाल होगा। हर कोई
स्मार्टफोन से जो चाहे कर सकता है शौपिंग,बैंकिंग, ऑनलाइन
बुक्स भी खरीद सकता है। पर जो फ़ालतू में फेसबुक, ट्विटर या चैट जैसे
एप्स यूज़ करते हैं उनकी साईकोलॅजी अभी भी मुझे पल्ले नहीं पड़ती.....कहीं भी निकलिए
हर कोई स्मार्टफोन पर अंगूठा घिसता हुआ मिलेगा। मंदिर में,
चाट के ठेले पर हर जगह और एक नयी मुसीबत आई है वॉट्स एप।..मुझे नहीं लगता उसमें
कुछ ख़ास है बस स्क्रीन टच करते रहो और सबको उल्लू बनाते रहो...अब तो आउट डोर्स के
गेम्स का कोई महत्व ही नहीं रह गया है बस बहाने रेडी रहते है कि बाहर गर्मी है,
कैसे खेलेंगे..ये बोलकर बस लग जाते है स्मार्टफोन से चैटिंग करने.. मैं सिर्फ
स्मार्टफोन की ही बात नहीं कर रही हूँ लैपटॉप, विडिओ गेम्स भी आज
की जेनरेशन के पीछे जोक की तरह चिपक गए हैं जिसकी वजह से ऐप्स के अलावा और कुछ दिखाई
ही नहीं देता है। बस कान में गन्दी सी लीड लगा लेंगे । आपको पता है लीड लगाने से
उसका सीधा असर आपके ब्रेन पर पड़ता है। जिससे आपकी सुनने,
समझने का स्टेमिना कम हो जाता है...आखिर ऐसा क्या है कि हम अपने हेल्थ के साथ भी
खिलवाड़ कर रहे हैं। बाहर जाकर आउट डोर्स गेम्स खेलने में हमें आलस आने लगती
है...कोई कुछ भी काम बोले तो गुस्सा 100
डिग्री के पार पहुंच जाता है। पहले तो मोबाइलए, इंटरनेट होते ही नहीं थे। सब बाहर
जाकर गेम्स खेलते थे पर अब तो एक दिन आपका वॉट्स एप आपके साथ न रहे तो बेचारे यंगस्टर्स
डिप्रेशन में चलें जाएँ । पर एक बार बस एक दिन आप मुझे अपने स्मार्टफोन से दूर रह
के दिखाइए बाहर जाकर क्रिकेट,बैडमिंटन खेलिए और तब बताईये किस्में
ज्यादा मज़ा आता है। पर मुझे मालूम है आप स्मार्टफोन के साथ ही कम्फर्ट महसूस
करेंगे चलिए खैर आपकी मर्ज़ी पर शायद आप इससे ज़रूर एक दिन बोर होंगे और वापस बाहर
जाकर अपना पसीना बहाएंगे...तब तक घिसो अंगूठ और करो फोटो शेयर अपने स्मार्टफोन
पर.... J
Tuesday, 17 June 2014
बच्चो की किताबों में ठाएँ-ठाएँ!
मैं बात कर रही हूं स्टूडेंट्स की
ऐसी कोई भी चीज़ किताबों में नहीं छापनी
चाहिए जिससे बच्चों पर बुरा असर पड़े...क्यूंकि ऐसी एज में बच्चे बहुत जल्दी चीज़ों
को अपनी लाइफ में उतारते है.।पब्लिशर को चाहिए की वो ऐसी स्टोरीज को पब्लिश करने
से मना कर दे जिसमें वायलेंस हो या जिसमें मार-काट का सीन बिलकुल साफ़-साफ़ बताये गए
हों। ऐसे सीन बच्चों को मेंटली स्ट्रोंग बनाने के बजाये उन्हें मेंटली वीक बना रहे
हैं। जिसका इफ़ेक्ट उनके फ्यूचर पर भी पड़ सकता है। मैं तो ये बात समझ चुकी हूँ । बट आपको
भी ये बात समझनी होगी नहीं तो आप भी भुगतने के लिए तैयार हो जाइये...now
I am sighning off take care…stay safe stay conscious…. L
Sunday, 15 June 2014
तूने मारी एंट्रियाँ रे दिल में बजी घंटियाँ
आज-कल की टेक्नोलॉजी कितनी एडवांस हो गयी है...जब भी किसी का फोने बजे या तो ..सुनो न संगमरमर या डिस्को दीवाने..शुरू हो जाता है । चाहे उस मोबाइल को ऑपरेट करने वाले की एज साठ या सत्तर ही क्यों न हो कल मम्मी के साथ शॅापिंग करने बाज़ार गयी एक बेचारे वृद्ध आदमी टूटी सी साइकिल और कपड़े भी ऐसे कि देख कर दया आ जाए। पर जब रिंगटोन सुनी तो सुन कर होश उड़ गए गाना था ..तूने मारी एंट्रियाँ रे दिल में बजी घंटियाँ रे टन टन टन टन.. उस समय तो हंसी रोक ली पर घर आकर जो ठहाका मार के हँसे हैं वो हम ही जानते हैं..आप के फ़ोन पर भी ऐसी रिंगटोन होती तो होगी...और ये सब रिंगटोंस को डलवाने के लिए आप शॉप पर जाओ तो कम पैसो में आपकी मनचाही रिंगटोन मिल जाएगी...टेक्नोलॉजी जहां आपकी मदद कर रही है वहां आपकी हंसी उड़ाने से भी नहीं चूकती...सिर्फ फि़ल्मी गाने ही नहीं भगवान् के भजन,मंत्र और यहाँ तक कि आपकी अपनी आवाज़ की भी रिंगटोन बन जाती है..। .और एक और बात अगर कोई आपको फ़ोन करे तो उसे भी आपके नाम की रिंगटोन सुना सकते है और भौकाल मार सकते है..रोज़-रोज़ फ़ोन पर मेसेज आते हैं तो मजबूरी है बार-बार मेसेज देखना की किसी फैमिली मेम्बर का इम्पोर्टेन्ट मेसेज तो नहीं आया..पर खोल के देखते ही दिमाग खराब होता है । मैं सिर्फ रिंगटोन की ही बात नहीं कर रही हूँ । आपको एक और मेसेज का किस्सा सुनाती हूँ । एक बार मेरे फ़ोन पे मेसेज आया मुझे लगा शायद किसी रिलेटिव का हो पर देखा तो होश उड़ गए। लिखा था आपसे बात करने को प्रिया है बेकरार फलाने नंबर पर कॉल करिए और कीजिये प्रिया से ढेर सारी बातें charges- rs… per\min… ये देखकर इतना गुस्सा आया की सारी भड़ास मेसेज को डिलीट करने में निकाल दी..। और कभी रिंगटोन बनाने के लिए मेसेज भी आया करते हैं कहती है
dial #### to make this song your ringtone charger ..rs\min...सिर्फ मेसेज तक बात ठहरती तो कोई बात नहीं थी अब तो फ़ोन करके भी दिमाग खराब करते हैं। बात उस समय की है जब मैं बहुत बीमार थी मम्मी भी बहुत परेशान थी...मेरे ताऊ जी,ताई जी.दादी,पापा सबके फ़ोन धडा-धड आ रहे थे एक बार फ़ोन बजा मम्मी ने उठाया तो गाना बजने लगा ..मन को अति भावे सइयां मन भाये रे हाय रे-हाय रे .. मम्मी का चेहरा गुस्से से लाल-पीला हो गया। दिन तो दिन रात में भी इनको चैन नहीं है। रात के डेढ़ बजे ऐसे कॉमर्शियल कॉल्स आती है की नींद टूट जाए...अब पता नहीं इन सब पर कब रोक लगेगी ये तो मैं भी नहीं जानती। तब-तक आप पकते रहिये इन मेसेजएस से और सुनते गाते रहिये ..एक पल तो अब हमें जीने दो जीने दो..
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Journey of a happy life...!!!!
शादी, ये सिर्फ एक शब्द नही है, शादी का असल मतलब आप तब समझ सकते हैं जब आप उस समय को महसूस करते हैं, उसके एक- एक मिनट को जीते हैं। शादी तय हो...
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‘शिनचैन नोहारा’’ ये नाम सुनकर आ गयी ना आपके चेहरे पर मुस्कान जी हाँ!! ये वही कार्टून है जिसे आप और हम मिलकर देखते हैं और हँस-हँस के लोट-पो...
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आज चिल्ड्रेन्स डे है हर बच्चा ख़ुशी ख़ुशी स्कूल की तरफ जा रहा है। कलरफुल ड्रेस में हाथ में गुलाब लेकर हर बच्चे के चेहरे पर बड़ी सी स्माइल ह...
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यह पोस्ट आपको थोडा कन्फ्यूज्ड मिलेगा पर क्या किया जा सकता है। सिर्फ ब्लोगिंग ही एक ऐसा जरिया है जिससे मैं अपनी दिमाग की उलझनों और दिमाग म...








