बाल सुधारगृह बच्चों को सुधारने के लिए बनाए जाते हैं पर सुधारगृह में ऐसा क्या होता है कि बच्चे वहां से भागने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चे सुधार गृह में इसलिए आते हैं ताकि जो क्राइम उन्होंने किये हैं वो आगे न करें इसलिए उन्हें सुधारघर में भेजा जाता है पर वहाँ का महौल ऐसा होता है कि बच्चे सुधार घर छोड़-छोड़ कर भाग रहे हैं। उनका शोषण होता है। सफाई का काम भी उनसे ही कराया जाता है। बच्चा सुधार घर में जाकर सुधरने के बजाय और बिगड़ जाता है। वहां के कर्मचारी उन बच्चों से बहुत बुरा बर्ताव करते हैं। अच्छा खाना और रहने की व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए वाहीं कर्मचारी बच्चों से सुधार घर का सारा काम कराते हैं जिससे मजबूरन बच्चों को भागना पड़ता है। और दूसरी बात सफाई का ध्यान बहुत कम रखा जाता है । कहीं छत टपकती है तो कहीं सीलन से बुरा हाल होता है। काम न करने पर बच्चों की पिटाई की जाती है। जिससे बच्चों का जीना दुश्वार हो जाता है। वहां के कर्मचारियों को लगता है की इन बच्चों ने किसी न किसी तरह का अपराध किया है, ये बच्चे कभी सुधर ही नहीं सकते। इसी मानसिकता के साथ वो बच्चों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करते हैं और बच्चों पर थर्ड डिग्री टॉर्चर होता है। जो पैसा बच्चों के लिए आता है उन्हें अधिकारी अपनी जेब में कर लेते हैं। ऐसे में बच्चों में कैसे सुधार आएगा? काश उन्हें सदबुद्धि आए।
Monday, 30 June 2014
Tuesday, 24 June 2014
स्मार्टफोन…? धिसते रहिए अंगूठा
जैसे ही स्मार्टफोन का नाम लेते हैं तो
ऐसा लगता है की वो कह रहा है “स्मार्टफोन नाम तो सुना होगा’...क्युकी
अब स्मार्टफोन की ऐसी आदत लग चुकी है की इससे बाहर निकलना बहुत मुश्किल है। अभी ही
स्मार्टफोन की इतनी खुमारी है तो ये सोचिये की आगे जाकर क्या हाल होगा। हर कोई
स्मार्टफोन से जो चाहे कर सकता है शौपिंग,बैंकिंग, ऑनलाइन
बुक्स भी खरीद सकता है। पर जो फ़ालतू में फेसबुक, ट्विटर या चैट जैसे
एप्स यूज़ करते हैं उनकी साईकोलॅजी अभी भी मुझे पल्ले नहीं पड़ती.....कहीं भी निकलिए
हर कोई स्मार्टफोन पर अंगूठा घिसता हुआ मिलेगा। मंदिर में,
चाट के ठेले पर हर जगह और एक नयी मुसीबत आई है वॉट्स एप।..मुझे नहीं लगता उसमें
कुछ ख़ास है बस स्क्रीन टच करते रहो और सबको उल्लू बनाते रहो...अब तो आउट डोर्स के
गेम्स का कोई महत्व ही नहीं रह गया है बस बहाने रेडी रहते है कि बाहर गर्मी है,
कैसे खेलेंगे..ये बोलकर बस लग जाते है स्मार्टफोन से चैटिंग करने.. मैं सिर्फ
स्मार्टफोन की ही बात नहीं कर रही हूँ लैपटॉप, विडिओ गेम्स भी आज
की जेनरेशन के पीछे जोक की तरह चिपक गए हैं जिसकी वजह से ऐप्स के अलावा और कुछ दिखाई
ही नहीं देता है। बस कान में गन्दी सी लीड लगा लेंगे । आपको पता है लीड लगाने से
उसका सीधा असर आपके ब्रेन पर पड़ता है। जिससे आपकी सुनने,
समझने का स्टेमिना कम हो जाता है...आखिर ऐसा क्या है कि हम अपने हेल्थ के साथ भी
खिलवाड़ कर रहे हैं। बाहर जाकर आउट डोर्स गेम्स खेलने में हमें आलस आने लगती
है...कोई कुछ भी काम बोले तो गुस्सा 100
डिग्री के पार पहुंच जाता है। पहले तो मोबाइलए, इंटरनेट होते ही नहीं थे। सब बाहर
जाकर गेम्स खेलते थे पर अब तो एक दिन आपका वॉट्स एप आपके साथ न रहे तो बेचारे यंगस्टर्स
डिप्रेशन में चलें जाएँ । पर एक बार बस एक दिन आप मुझे अपने स्मार्टफोन से दूर रह
के दिखाइए बाहर जाकर क्रिकेट,बैडमिंटन खेलिए और तब बताईये किस्में
ज्यादा मज़ा आता है। पर मुझे मालूम है आप स्मार्टफोन के साथ ही कम्फर्ट महसूस
करेंगे चलिए खैर आपकी मर्ज़ी पर शायद आप इससे ज़रूर एक दिन बोर होंगे और वापस बाहर
जाकर अपना पसीना बहाएंगे...तब तक घिसो अंगूठ और करो फोटो शेयर अपने स्मार्टफोन
पर.... J
Tuesday, 17 June 2014
बच्चो की किताबों में ठाएँ-ठाएँ!
मैं बात कर रही हूं स्टूडेंट्स की
ऐसी कोई भी चीज़ किताबों में नहीं छापनी
चाहिए जिससे बच्चों पर बुरा असर पड़े...क्यूंकि ऐसी एज में बच्चे बहुत जल्दी चीज़ों
को अपनी लाइफ में उतारते है.।पब्लिशर को चाहिए की वो ऐसी स्टोरीज को पब्लिश करने
से मना कर दे जिसमें वायलेंस हो या जिसमें मार-काट का सीन बिलकुल साफ़-साफ़ बताये गए
हों। ऐसे सीन बच्चों को मेंटली स्ट्रोंग बनाने के बजाये उन्हें मेंटली वीक बना रहे
हैं। जिसका इफ़ेक्ट उनके फ्यूचर पर भी पड़ सकता है। मैं तो ये बात समझ चुकी हूँ । बट आपको
भी ये बात समझनी होगी नहीं तो आप भी भुगतने के लिए तैयार हो जाइये...now
I am sighning off take care…stay safe stay conscious…. L
Sunday, 15 June 2014
तूने मारी एंट्रियाँ रे दिल में बजी घंटियाँ
आज-कल की टेक्नोलॉजी कितनी एडवांस हो गयी है...जब भी किसी का फोने बजे या तो ..सुनो न संगमरमर या डिस्को दीवाने..शुरू हो जाता है । चाहे उस मोबाइल को ऑपरेट करने वाले की एज साठ या सत्तर ही क्यों न हो कल मम्मी के साथ शॅापिंग करने बाज़ार गयी एक बेचारे वृद्ध आदमी टूटी सी साइकिल और कपड़े भी ऐसे कि देख कर दया आ जाए। पर जब रिंगटोन सुनी तो सुन कर होश उड़ गए गाना था ..तूने मारी एंट्रियाँ रे दिल में बजी घंटियाँ रे टन टन टन टन.. उस समय तो हंसी रोक ली पर घर आकर जो ठहाका मार के हँसे हैं वो हम ही जानते हैं..आप के फ़ोन पर भी ऐसी रिंगटोन होती तो होगी...और ये सब रिंगटोंस को डलवाने के लिए आप शॉप पर जाओ तो कम पैसो में आपकी मनचाही रिंगटोन मिल जाएगी...टेक्नोलॉजी जहां आपकी मदद कर रही है वहां आपकी हंसी उड़ाने से भी नहीं चूकती...सिर्फ फि़ल्मी गाने ही नहीं भगवान् के भजन,मंत्र और यहाँ तक कि आपकी अपनी आवाज़ की भी रिंगटोन बन जाती है..। .और एक और बात अगर कोई आपको फ़ोन करे तो उसे भी आपके नाम की रिंगटोन सुना सकते है और भौकाल मार सकते है..रोज़-रोज़ फ़ोन पर मेसेज आते हैं तो मजबूरी है बार-बार मेसेज देखना की किसी फैमिली मेम्बर का इम्पोर्टेन्ट मेसेज तो नहीं आया..पर खोल के देखते ही दिमाग खराब होता है । मैं सिर्फ रिंगटोन की ही बात नहीं कर रही हूँ । आपको एक और मेसेज का किस्सा सुनाती हूँ । एक बार मेरे फ़ोन पे मेसेज आया मुझे लगा शायद किसी रिलेटिव का हो पर देखा तो होश उड़ गए। लिखा था आपसे बात करने को प्रिया है बेकरार फलाने नंबर पर कॉल करिए और कीजिये प्रिया से ढेर सारी बातें charges- rs… per\min… ये देखकर इतना गुस्सा आया की सारी भड़ास मेसेज को डिलीट करने में निकाल दी..। और कभी रिंगटोन बनाने के लिए मेसेज भी आया करते हैं कहती है
dial #### to make this song your ringtone charger ..rs\min...सिर्फ मेसेज तक बात ठहरती तो कोई बात नहीं थी अब तो फ़ोन करके भी दिमाग खराब करते हैं। बात उस समय की है जब मैं बहुत बीमार थी मम्मी भी बहुत परेशान थी...मेरे ताऊ जी,ताई जी.दादी,पापा सबके फ़ोन धडा-धड आ रहे थे एक बार फ़ोन बजा मम्मी ने उठाया तो गाना बजने लगा ..मन को अति भावे सइयां मन भाये रे हाय रे-हाय रे .. मम्मी का चेहरा गुस्से से लाल-पीला हो गया। दिन तो दिन रात में भी इनको चैन नहीं है। रात के डेढ़ बजे ऐसे कॉमर्शियल कॉल्स आती है की नींद टूट जाए...अब पता नहीं इन सब पर कब रोक लगेगी ये तो मैं भी नहीं जानती। तब-तक आप पकते रहिये इन मेसेजएस से और सुनते गाते रहिये ..एक पल तो अब हमें जीने दो जीने दो..
Saturday, 14 June 2014
ये स्टंटइंग बड़ी ड्रामा क्वीन है
आप मुझसे पूछेंगे की स्टंटइंग ही ड्रामा क्वीन क्यों??अरे आप अच्छी तरह जानते हैं...एक बार जब स्टंट करने का भूत सवार जो जाता है तो उससे दूर भागना आसान नहीं है...जैसे ही यंग जेनरेशन तो नयी बाइक मिलती है तो रोड पर स्टंट स्टार्ट हो जाते है जिससे रोड पर चलने वालों को अच्छी-खासी चोट लग जाती है उस गलती के लिए जो उन्होंने की ही नहीं होती...अगर ट्राफिक पुलिस इनसे लाइसेंस मांगती है तो लाइसेंस ही नहीं होता है इनके पास...बस बाइक्स चलाने की परमिशन दे दो इनको अरे सिर्फ यूथ ही नहीं छोटे-छोटे बच्चे भी अपने A1 साइकिल पर स्टंट करते हुए दिख जाते है इसका अच्छा उदाहरण आपको मेरे ब्लाक के नीचे मिल जाएगा1st या 2nd क्लास में पढने वाले बच्चे साइकिल उछाल-उछाल के ऐसे स्टंट करते हैं जैसे स्टंट बाएँ हाथ का खेल हो अगर गलती से गिर भी जाएँ तो हँस करके फिर से साइकिल खुमाने लागतें है..आज न्यूज़ में देखा की रात में दिल्ली की सुनसान रोड पर एक बन्दे के सर पर इतनी जोर से चोट लगी की वहीँ पर बेचारा भगवान् को प्यारा हो गया इसमें और किसी की गलती नहीं है बस उन्ही लोगों की गलती है जो स्टंट करके अपनी जान जोखिम में डालते है...अब इन सबको कैसे रोका जाए अब नयी सरकार आई है तो उनसे ये भी उम्मीद है की स्टंटइंग के खिलाफ कोई सख्त एक्शन लिया जाए जिससे आगे की यूथ जेनरेशन को इसका बुरा सामना न करना पड़े...सच में ये स्टंटइंग बड़ी ड्रामा क्वीन है...और पेरेंट्स को भी ध्यान देने की ज़रुरत है की बच्चे बाइक्स लेकर उनका गलत इस्तेमाल न करें...तबतक stay smart stay safe bye take care…..
Friday, 13 June 2014
प्रॉपर्टी डीलर्स को सजा मिले

गुरुवार शाम को न्यूज़ देखा तो फिर से गुस्से का पारा चढ़ गया। महाराष्ट्र के मुंबई शहर की न्यूज़ है की कैम्पा कोला अपार्टमेंट्स को सिर्फ 5 फ्लोर्स बनाने की परमीशन थी पर बिल्डर्स ने उसके ऊपर 105 फ्लैट्स अधिक बना दिए...अब उन इल्लीगल फ्लैट्स को तोडऩे के आदेश दे दिए गए हैं। ये तो अच्छी बात है की इल्लीगल फ्लैट्स तोड़े जाएंगे और इस न्यूज़ से अवैध अपार्टमेंट्स बनाने वाले कोई गैरकानूनी काम नही करेंगे पर उन लोगों का क्या जो इन फ्लैट्स में रह रहे हैं। वो लोग कहाँ जाएंगे जिनका इस फ्लैट के सिवाय और कोई घर नहीं हैं। उन लोगों के ज़ख्म पर तो नमक छिडक़ दिया गया है और इन लोगों के तो पैसे भी हड़प लिए गए हैं। इन लोगों को तो पता भी नहीं था की ये फ्लैट्स इल्लीगल हैं। जब ये रहने आये तो लोगों को पता चला की ये इल्लीगल तरीके से फ्लैट्स बनाए गए हैं...तब तो आप अपने कस्टमर्स के आँख में धूल झोंक रहे हो..सिर्फ इन्ही लोगो की वजह आज लोग घर खरीदने से डरते हैं...मतलब आप इतनी जांच पड़ताल करके अगर फ्लैट लेते हो तबभी कुछ न कुछ खोंट निकल ही आता है। तभी आधे से ज्यादा लोग फ्लैट्स खरीदने के बजाय अपना घर बनवाना प्रेफर करते हैं...पर इन फ्लैट्स में रह रहे लोगों का क्या होगा, वो कहाँ जाएँगे ये टॉपिक इम्पोर्टेन्ट है। घर तो एक झटके में गिर जाएगा पर उनमें रहने वाले लागों की तो लाइफ भर की मेहनत का पैसा मिट्टी में मिला दिया इन बेवकूफों ने....सिर्फ बॉम्बे ही नहीं बहुत सारे शहरों में ऐसा रोज़ होता होगा पर छोटे शहर होने की वजह से इनको हाईलाइट नहीं किया जा पाता है और ये सब गोरख धंधे दबे के दबे रह जाते हैं। अप ये सोचना हमारा काम है की हम इन सब खबरों को लेकर कितना सिरियस हैं....अब आगे देखिये की
‘कैम्पा कोला’ का ‘कोका कोला’ बनता है की नहीं..
´...then take care and stay conscious’ :-).
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Journey of a happy life...!!!!
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