मेरा बचपन नाना-नानी की कहानियों को सुनते ही बीता जब मेरी गर्मियों की
छुट्टियां शुरू होती थी और मेरे स्कूल से लौटते ही माँ कहती थी की सामान पैक करो
इलाहाबाद जान है एक तो नाना-नानी से मिलने की खुश,उन दोनों का लाड प्यार और ऊपर से
उनकी आवाज़ में मीठी-मीठी कहानियां...नानी के बाजुओ पर सर रखकर आराम से लेटकर कहानियाँ
सुनना मुझे बहुत पसंद था...
मेरी नानी बहुत ही अच्छी और बहुत ही शांत रहती थी...मेरे जन्मदिन पर माँ और
पापा से भी पहले मेरे नाना-नानी का फ़ोन आता था और दोनों मिलकर मुझे गुड विशेस देते
थे...उनका रोज़ दिन में ७-८ बार फ़ोन करना ऐसा लगता था मानो मैं उनके साथ ही
हूँ...बहुत याद आते हैं वो दिन एक बार मैं नर्सरी में पढ़ती थी मैं पापा के पास गयी
और कहा की पापा इस कागज़ पर नाना और नानी का फ़ोन नंबर लिख के दे दीजिये पापा काम
मैं बहुत व्यस्त थे उन्होंने फटाक से मुझे नानी का नंबर लिख के दे दिया शाम को
पापा के ऑफिस जाते ही मैंने उन्हे चुपके से फ़ोन कर दिया और कहा किक नानी मुझे आपकी
बहुत याद आ रही है उन्होंने कहा अरे मेरी प्यारी चुन-चुन मुझे भी तुम्हारी बहुत
याद आ रही थी अच्छा हुआ तुमने फ़ोन कर दिया उन्होंने कहा बेटा मम्मी कहाँ हैं बात
कराओ और मेरी सिट्टी-पिट्टी गुल...बहित डर लग रहा था की अगर पापा को इसके बारे में
पता चल गया तो मेरी खैर नहीं....पर ऐसा कुछ नहीं हुआ...सब भगवान् की दया थी...एक
खतरनाक किस्सा आपको सुनाती हूँ मैं करीब ६ साल की थी नानी के घर एक नै वाशिंग मशीन
आई थी मैं पहली बार वाशिंग मशीन देख रही थी...नानी ने कहा चुन चुन जाओ बाहर रखे
कपड़े उठा लाओ मैं इतनी ज्यादा खुश थी की ज़मीन पे गिरा हुआ पानी ही नहीं देख पायी
और मेरा पैर फिसल गया मेरी आँख शेटर में फंस गयी जिसे निकालना बहुत मुश्किल हो
गया....मेरा बड़ा भाई दौड़ के आया तो देखा मैं दर्द से परेशान थी और पूरी फर्श पर
खून-खून था वो जल्दी से मुझे उठा के अन्दर ले गया सबका ध्यान वाशिंग मशीन से हटकर
मुझपर आ गया.और उस चोट का निशान आज भी मेरी आँख पर मौजूद है..उस समय मैंने जितने
भी परेशान चेहरे देखे उसमें सबसे परेशान
चेरा मेरी नानी का ही था...अब नानी के बाद नाना जी के बारे में बात करना तो बनता
है...मेरे नानाजी आर्मी में थे...मुझे शुरू से लेकर अब तक के जीवन में नाना जी का लगाव
देखने को मिलता है...जिस दिन मेरा रिजल्ट आने का दिन होता है मेरे रिजल्ट आने के
आधे घंटे पहले ही उनका फ़ोन आना शुरू हो जाता था और आज भी यही होता है...उनका इस
तरह से फ़ोन करना मेरे लिए एक आशीर्वाद की तरह होता है और जिस दिन उनका फ़ोन नहीं
आता पूरा घर परेशान हो जाता है...बचपन में मेरी शैतानियाँ आसमान पर चढ़ी हुयी थी वो
बेचारे पौधे लगाते थे और मेरा काम उन पौधों को उखाड़ना था नाना जी इन बातो को लेकर
कभी गुस्सा नहीं हुए बस उनका यही वाक्य हमेशा रहता था एक था “ये क्या कर रहे हो
हाँ” और दूसरा था “अभी मारता हूँ”उनकी डांट सुनने के बाद बस मैं पाइप उठाटी थी और
मेरा पौधों को पानी देना शुरू हो जाता था...जबभी मैं उनसे कहानियाँ सुनाने का कहती
थी तो हर बार एक ही लाइन “एक शेर था बहुत ही धम्माजा”...उसके बाद स्टोरी ख़तम पूछो
क्यों क्यूंकि नींद मुझे घेर लेती थी...एक और बात मुझे आज भी याद है जब भी नानाजी
पूजा करने के लिए दिया और अगरबत्ती जलाते थे तो मैं उस अगरबत्ती को अपनी फूक से
बुझा देती थी मेरी यही शरारत नानाजी को
बहुत पसंद थी आज भी जब मैं मम्मी के साथ मिलकर अपने पुराने दिन याद कर हूँ तो यही
सब याद करने को रह जाता है और फिर काम में वापस लगना पड़ता है और मेरे बचपन की
यादें फिर से धुंधली पड़ जाती हैं...इलाहाबाद जाकर वही घर वही जगह जहां मेरी आँख पर
चोट लगी थी देखकर वाही यादें मेरे ज़हन में ताज़ा हो जाती है जिसे भूलना मेरे लिए जीवन भर कभी संभव नहीं हो
पायेगा...miss u nanaji and naniji….
With
love,
Tejaswini Ojha
(chun-chun)…J

5 comments:
Bahut shandar....aur likho :-)
thank you papa.... ;)
तुम्हारा इमैजिनेश्न और नैरेटिंग पावर बहुत अच्छी है इसे और इम्प्रूव करो
तुम्हारा इमैजिनेश्न और नैरेटिंग पावर बहुत अच्छी है इसे और इम्प्रूव करो
thanks papaji
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