मैं बात कर रही हूं स्टूडेंट्स की
टेक्स्ट बुक्स की...जिस एज में उनको अच्छी-अच्छी बातें सिखाई जानी चाहिए उस समय वो
बच्चे हत्या-सुसाइड और खून से रंगे हाथों के बारे में पढ़ रहे हैं...ऐसी स्टोरीज जो
बच्चो के मन में वायलेंस क्रियेट कर रही है। वही सब अगर बच्चों की किताबों में
मेंशन्ड है तो बच्चे क्या कर सकते हैं...हर कहानी में कोई न कोई ऐसे सीन्स हैं
जिससे बच्चो पर बसा असर पड़ता है। ये बात सिर्फ
12th
के स्टूडेंट्स के लिए ही नहीं है बल्कि आगे के स्टूडेंट्स भी
कुछ ऐसे चैप्टर्स पढ़ रहे हैं जिनमें भर-भर के वायलेंस है। हर दूसरे चैप्टर का यही
हाल है। इसमें सिर्फ हिंट दिया जाना चाहिए ये नहीं की फलाने आदमी फलाने आदमी को
मार दिया और उसका पूरा सीन आंखो के सामने रख दिया। जिस एज में बच्चो को पोयम्स और
प्रोडक्टिव स्टोरीज पढ़नी चाहिए वो बच्चे ऐसी एज में मार-काट पढ़ रहे हैं। और यहाँ तो
सरे आम ये बता दिया जाता है कि एक आदमी ने दूसरी आदमी पर चाकू से कितने वार किये।
ऐसी कोई भी चीज़ किताबों में नहीं छापनी
चाहिए जिससे बच्चों पर बुरा असर पड़े...क्यूंकि ऐसी एज में बच्चे बहुत जल्दी चीज़ों
को अपनी लाइफ में उतारते है.।पब्लिशर को चाहिए की वो ऐसी स्टोरीज को पब्लिश करने
से मना कर दे जिसमें वायलेंस हो या जिसमें मार-काट का सीन बिलकुल साफ़-साफ़ बताये गए
हों। ऐसे सीन बच्चों को मेंटली स्ट्रोंग बनाने के बजाये उन्हें मेंटली वीक बना रहे
हैं। जिसका इफ़ेक्ट उनके फ्यूचर पर भी पड़ सकता है। मैं तो ये बात समझ चुकी हूँ । बट आपको
भी ये बात समझनी होगी नहीं तो आप भी भुगतने के लिए तैयार हो जाइये...now
I am sighning off take care…stay safe stay conscious…. L
1 comment:
achchi books hi achche sanskaar dweti hain ..so read good books
Post a Comment