Sunday, 21 August 2016

      
                                   क्यों
रे कदम तू चलते चलते डगमगाया क्यों,
आंधीयों से डरकर तू घबराया क्यों.
एक समय था कहा करते थे लोग मुझे,
क्या करेगी तू? कभी सोचा है तूने?
पर आज वो सिर गर्व से उठाते हैं क्यों.
कितनी कोशिश की, समझूँ दुनिया दारी मैं ,
पर भा न पायी चालाकी, मुझे ना जाने क्यों.
शायद जिनको मैं जानती हूँ उन्होंने दिया हौसला मुझे,
तभी मैं सोचूँ तेजस्विनी तूने हिम्मत ना हारी क्यों.
दुःख भी मिले ख़ुशी भी मिली ना हारने दिया पापा आपने मुझे,
गिर के उठकर आपको साथ देखकर आप मुस्कुराए यूँ,
हाथ पकड़ लो बेटा अरे तुम्हारे आखों में ये नमी क्यों,
हूँ ना मैं तुम्हारे साथ!! फिर उठने-गिरने से तू घबराई क्यों??.
कभी गिरना तो पूछना अपने आप से ये सवाल बेटा
कदम तू चलते चलते डगमगाया क्यों??,
आंधीयों से डरकर तू घबराया क्यों??.
                         -राजीव तेजस्विनी ओझा.


Saturday, 13 August 2016

       तेजस्विनी के दोहे #१        
#१ लो आ गया 15 अगस्त, लो आ गया 15 अगस्त,
दुकानदार हज़ारों ऑफर ले कर आये
तरह तरह के ऑफर दे कर, तरह तरह के ऑफर दे कर,
क्यों हमे उल्लू बनाएं रे हाय रे क्यों हमे उल्लू बनाएं.

भगवान् को तो छोड़ दो भगवान् को तो छोड़ दो तुम,
क्यों उन्हें बदनाम कराये,
 उनके नाम पे पैसा ले कर, 

क्यों तो ठगी मचाये रे हाय रे क्यों तू ठगी मचाये.

Thursday, 11 August 2016

                                                              कर दिखाउंगी मैं...
अँधेरे क्यों इतना गुरूर में है तू,
एक दिन सुबह भी मैं लाऊंगी,
उसी सुबह का हाथ पकड़ के,
लोहे से सोना बन के दिखाउंगी.
         -- राजीव तेजस्विनी ओझा.
                           मैं 
हूँ मैं एक लेखक मैं ही अपने लेखों को रचती हूँ,
सोचती हूँ फिर अपनी सोच को कागज़ पे उतारा करती हूँ.
लोगों की बातें प्रोत्साहित भी करती निराश भी करती,
पर फिर भी मैं गिर गिर के उठती हूँ.
रोज़ दिन की शुरुवात मैं मुस्कुरा के करती हूँ,
कुछ भी हो जाए कदम नही पीछे हटने देती हूँ.
सारे संसार की क्या परवाह मुझे,
सिर्फ अपनों की परवाह ही करती हूँ.
बहुत सोच लिया दुनिया के बारे में.
अब दुनिया से अलग राह बनाती हूँ.
हर दिन मेरे लिए नया जोश लाता है और मैं अपने मन से कहती हूँ 
क्या नही कर सकती हूँ ?? मैं क्या नही कर सकती हूँ??
ये वादा सबसे और अपने आप से भी है मुझे,
बस एक मुस्कान से ही सारे जग को जीतूंगी मैं.
चल रही हूँ एक रास्ते पे नही पता मंजिल कहाँ है,
पर पापा आपका हाथ पकड़ के वो मंजिल पर भी पहुँच जाउंगी मैं.
 सब हैं मेरे साथ हौसला बढाने के लिए, औरों की क्या चिंता,
पर एक वादा करती हूँ आप सबका सर गर्व से ज़रूर उठाऊंगी मैं.
                              -राजीव तेजस्विनी ओझा.
                                          

 

    

Journey of a happy life...!!!!

शादी,  ये सिर्फ एक शब्द नही है, शादी का असल मतलब आप तब समझ सकते हैं जब आप उस समय को महसूस करते हैं, उसके एक- एक मिनट को जीते हैं। शादी तय हो...