मैं
हूँ मैं एक लेखक मैं
ही अपने लेखों को रचती हूँ,
सोचती हूँ फिर अपनी
सोच को कागज़ पे उतारा करती हूँ.
लोगों की बातें
प्रोत्साहित भी करती निराश भी करती,
पर फिर भी मैं गिर
गिर के उठती हूँ.
कुछ भी हो जाए कदम
नही पीछे हटने देती हूँ.
सारे संसार की क्या
परवाह मुझे,
सिर्फ अपनों की
परवाह ही करती हूँ.
बहुत सोच लिया
दुनिया के बारे में.
अब दुनिया से अलग
राह बनाती हूँ.
हर दिन मेरे लिए नया
जोश लाता है और मैं अपने मन से कहती हूँ
क्या नही कर सकती हूँ
?? मैं क्या नही कर सकती हूँ??
ये वादा सबसे और
अपने आप से भी है मुझे,
बस एक मुस्कान से ही
सारे जग को जीतूंगी मैं.
चल रही हूँ एक
रास्ते पे नही पता मंजिल कहाँ है,
पर पापा आपका हाथ
पकड़ के वो मंजिल पर भी पहुँच जाउंगी मैं.
सब हैं मेरे साथ हौसला बढाने के लिए, औरों की
क्या चिंता,
पर एक वादा करती हूँ
आप सबका सर गर्व से ज़रूर उठाऊंगी मैं.
-राजीव तेजस्विनी
ओझा.

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