क्यों
रे कदम तू चलते चलते
डगमगाया क्यों,
आंधीयों से डरकर तू
घबराया क्यों.
एक समय था कहा करते
थे लोग मुझे,
क्या करेगी तू? कभी
सोचा है तूने?
पर आज वो सिर गर्व
से उठाते हैं क्यों.
कितनी कोशिश की, समझूँ
दुनिया दारी मैं ,
पर भा न पायी
चालाकी, मुझे ना जाने क्यों.
शायद जिनको मैं
जानती हूँ उन्होंने दिया हौसला मुझे,
तभी मैं सोचूँ
तेजस्विनी तूने हिम्मत ना हारी क्यों.
दुःख भी मिले ख़ुशी
भी मिली ना हारने दिया पापा आपने मुझे,
गिर के उठकर आपको
साथ देखकर आप मुस्कुराए यूँ,
हाथ पकड़ लो बेटा अरे
तुम्हारे आखों में ये नमी क्यों,
हूँ ना मैं तुम्हारे
साथ!! फिर उठने-गिरने से तू घबराई क्यों??.
कभी गिरना तो पूछना
अपने आप से ये सवाल बेटा
कदम तू चलते चलते
डगमगाया क्यों??,
आंधीयों से डरकर तू
घबराया क्यों??.
-राजीव तेजस्विनी ओझा.

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