कितनी दूर आ गयी हूँ
मैं उस खिलौने से खेल कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ
मैं उस समय को पीछे छोड़कर,
कहाँ चले गये तुम
बिन बताकर,
काश आ जाए वापस वो
खरगोश मेरा,
जिसे सुलाती थी मैं अपने
बगल में लेटाकर,
न जाने कहाँ गया वो
खरगोश मुझे छोड़कर,
कितनी दूर आ गयी हूँ
मैं उस खिलौने से खेल कर.
अब तो बस जीना है
मुझे किताबों के अन्दर,
जीना चाहती हूँ मैं
फिर से बचपन के अन्दर,
वापस आ जाए वो मेरा
प्यारा बचपन,
फिर से जी लूंगी मैं
उसे बच्चा बनकर.








